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Friday, 20 August 2010

जागते रहिए ज़माने को जगाते रहिए

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जागते रहिए ज़माने को जगाते रहिए
ख़ैरियत-ख़ैरियत का शोर मचाते रहिए


वो जो सह लें, न कहें-उनको सहाते रहिए
वर्ना कह दें तो मियाँ ! चेहरा छुपाते रहिए


शम्मा यादों की मज़ारों पे जलाते रहिए
रोज़ इक बेबसी का जश्न मनाते रहिए


हुस्न गुस्ताख़ तमन्ना से दूर? नामुम्किन!
लाख बारूद को आतिश से बचाते रहिए


या तो खा जाइए, या रहिए निवाला बनते,
शाम के भोज का दस्तूर निभाते रहिए
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और शे'र हैं, अभी फुर्सत नहीं है टाइप करने की. बाद में लाऊँगा...

Friday, 6 August 2010

उन्होंने कह दिया अच्छा सुख़न है


ज़माना पेश हम से ढंग से आए-
ज़माने को भी कोई तो बताए!


यही सोचे हैं बैठे सर झुकाए
वो देखें आज क्या तोहमत लगाए

उन्होंने कह दिया अच्छा सुख़न है
मेरे अश'आर ख़ुश-ख़ुश लौट आए


मुहब्बत की भी कोई उम्र तय है?
अगर अब है तो फिर आए-न-आए!


झरे दिन जैसे मुट्ठी रेत की, या
उमर-मछली फिसल दरिया में जाए
………उमर-मछ्ली फिसल दरिया में जाए!

Monday, 21 June 2010

लोगों को नींद देर रात तक नहीं आती

शे'र ख़ुद मिट गया ग़ज़ल होकर
प्रश्न शर्मिंदा रहा - हल होकर

बात ये है कि कभी कहा था -
"जबसे मेरा अफ़साना शहर में हुआ है आम
लोगों को नींद देर रात तक नहीं आती
"

कल ख़्याल आया कि क्यों न इसे ग़ज़ल की शक्ल दी जाए! सो कुछ बना तो - मगर वो शे'र न रहा। अब पसोपेश के तसव्वुर में हूँ - इसे किस शक्ल में जीने दिया जाए - शे'र को जो 'मदरप्लाण्ट' है, या नए अश'आर को जो नवांकुर हैं?
फ़िलहाल तो सोच में ही हूँ।
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होठों पे दिल-ज़ेहन की बात तक नहीं आती
उनकी कोई भी चाल-मात तक नहीं आती

अपनी कोई साज़िश भी घात तक नहीं आती
जाँ-बख़्शी* भी उनकी हयात* तक नहीं आती

हैं काम भलाई के या ऐयारी का आलम
दाएँ की ख़बर बाएँ हाथ तक नहीं आती#

जबसे मेरा अफ़साना शहर में हुआ है आम
ख़ुश-नाचते-गाते बरात तक नहीं आती

सूरज भी लगे जैसे न सोया हो रात भर
ख़ुद रात भी - अब देर रात तक नहीं आती

जिनके बिना इक दिन कभी जीना मुहाल था
ता'ज्जुब है कि अब उनकी याद तक नहीं आती

तन्हाइयाँ हैं, बस! न ख़ुशी है - न कोई ग़म
बेकैफ़* उम्र क्यूँ वफ़ात* तक नहीं आती
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जाँ-बख़्शी = जीवन-दान
हयात = जीवन, ज़िन्दगी
बे-कैफ़ = आनन्द-रहित, बेमज़ा, जब सारे नशे उतर चुके हों
वफ़ात = मृत्यु, मोक्ष, मुक्ति
#ईसा का संदेश :  "भलाई का काम इस तरह करो कि दाएँ हाथ को बाएँ हाथ की ख़बर न हो""

Thursday, 17 June 2010

दहन (ग़ज़ल) : चित्र बोलोजीडॉट्नेट से साभार

एक पूर्वप्रकाशित रचना है 'दहन'। यह नेट पर मेरी प्रथम हिन्दी कविता थी - जो बोलोजीडॉट्नेट पर 2000 में प्रकाशित हुई। फिर दोबारा नहीं लिखा उस जालस्थल पर, क्योंकि उन्होंने मेरी कविता को संपादित कर दिया - प्रकाशन के पूर्व और उससे कविता मर गयी। यह मेरी स्वीकृति के बिना था और मेरी समझ में कविता या ग़ज़ल में सुधार करने का अधिकार मूल रचनाकार के अतिरिक्त किसी को नहीं होता।
यहीं पूर्णिमा वर्मन जी से परिचय हुआ और उस समय कुछ हिन्दी के लिए करने का जोश कुछ दिन चला। फिर समय ने करवट बदली तो हमने एक लम्बी चुप्पी साध ली। अब हम नौसिखिए हो गए,मज़ा आ रहा है।
दहन

मासूम मुहब्बत से कई लोग जल गए
हम जल के यूँ मिले के सभी हाथ मल गए


दिल में रहा न जोश तो दिल-दिल नहीं रहे
वो दिल ही क्या जो अक़्ल के हाथों सँभल गए


तक़्दीर की बुलन्दी भी लोगों को खल गयी
निकला ज़रूर दम, मगर अरमाँ निकल गए


उनको गिला - के वैसे भी हम जी तो न पाते
ये तो उन्हें जलाने को हम साथ जल गए


माचिस की तीलियों की तरह उम्र क्या ढली
सब जात-पाँत ख़ाक़ की सूरत में ढल गए



जो बन सके मशाल - मेरे साथ चल पड़े
जो डर गए, वो रुक-के - समझे हमको छल गए


जब तक जिए मुरझाए से घुट-घुट के साँस-साँस
जल कर लगा के हम खिले और बन कँवल गए


आशिक़ ये समझे जलने से दुनिया बदल गई
दुनिया ये समझी जीने के मानी बदल गए


दुनिया की इस सराय में सारे हैं मुसाफ़िर
कल आए थे-कुछ आज, तो कुछ लोग कल गए
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और आख़िर में एक शे'र तस्वीर की तारीफ़ में भी -

"तस्वीर ख़ुद ग़ज़ल है के नज़रों का इक फ़रेब
इतना हसीं के जलने को लाखों मचल गए!"

Friday, 11 June 2010

लगा माँ की मुझे दुआ सा कुछ

शायरी - ग़ज़लें, नज़्में क्या-क्या कुछ
लगा माँ की मुझे दुआ सा कुछ

जाने जुगनू कि हौसले के चराग़
यादों-यादों जला बुझा सा कुछ

फिर से कुछ सोच लिया शाम ढले
हुआ फिर दिल से लापता सा कुछ

बेरूख़ी भी है, और ख़फ़ा भी नहीं-
ज़ुल्म है, पर लगे अदा सा कुछ

बूढ़े पत्तों की बेबसी कि उन्हें
कहे पतझड़ भी बेवफ़ा सा कुछ

अब के सावन में घटा के अंदाज़
साथ रहते हुए जुदा सा कुछ

कुछ कहा हमने - लोग कुछ समझे
और हर शख़्स फिर ख़फ़ा सा कुछ

जुड़ते जाते हैं लाखों मंसूबे
दिल ही दिल में है टूटता सा कुछ

मुझसे पूछी है मेरी राय तो अब
देख ले तू भी आइना सा कुछ
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अलहदा -

और अश'आर मैं कह सकता था
पर है अब मुझमें अनमना सा कुछ

इश्क़ का फाड़ के ख़त गुस्से में
हुस्न अब फिर है मेहरबाँ सा कुछ

तेरी रहमत पे शक़ नहीं, लेकिन
अपनी बर्बादी - क़ायदा सा कुछ

हमको सारे तेरे इल्ज़ाम क़ुबूल
और फिर भी तुझे गिला सा कुछ!

"एक बीमार भी बाक़ी न बचे"
बँटा फिर ज़हर या दवा सा कुछ

हम ये समझे - कि कुछ नहीं समझे
ज़माना समझा जाने क्या-क्या कुछ

Wednesday, 9 June 2010

कितना वो पानी में है

ख़ुल्द में कब वो मज़ा जो दुनिया-ए-फ़ानी में है
होश क्या जाने कि क्या-क्या है जो नादानी में है


हौसलों का, हिम्मतों का इम्तेहाँ है ज़िन्दगी
जो मज़ा मुश्क़िल में है, वो ख़ाक़ आसानी में है


जो सदा मँझधार से, लौटा भँवर को जीतकर;
साहिलों पर बहस अब तक, कितना वो पानी में है


जीना बिन-ख़्वाहिश के - या लेकर अधूरी हसरतें
इत्तिक़ा दर-अस्ल ख़ुद ख़्वाहिश की तुग़यानी में है


ख़ुदपरस्ती में जिया, ख़ुद के लिए मरता रहा
ख़्वाहिशे-जन्नत में वो भी सफ़हे-क़ुर्बानी में है
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ख़ुल्द = स्वर्ग, जन्नत
फ़ानी = नश्वर, नाशवान
साहिल = किनारा, तट
इत्तिक़ा = संयम, इन्द्रिय निग्रह
तुग़यानी = बाढ़, उफ़ान
ख़्वाहिशे-जन्नत = स्वर्ग की इच्छा
सफ़हे-क़ुर्बानी = क़ुर्बानी / बलिदान देने के लिए लगी हुई क़तार

Sunday, 30 May 2010

साक़िया और पिला, और पिला

साक़िया और पिला, और पिला
सितम कम गुज़रे अभी और जिला

कोई शिक्वा, न शिकायत, न गिला
ऐसे देते हैं मुहब्बत का सिला !

इरादतन कुरेदता हो जो ज़ख़्म,
ऐसा दुनिया में पराया न मिला

हमने उसको बना लिया माली
जिसकी मर्ज़ी बिना पत्ता न हिला

वही रिमझिम है - वही इन्द्रधनुष
या ख़ुदा याद फिर उनकी न दिला

Tuesday, 18 May 2010

बरसों बाद

शे'र कहते बना है बरसों बाद
दर्द से सामना है बरसों बाद

आमना-सामना है बरसों बाद
मामला फिर ठना है बरसों बाद


आज फिर ख़ंजरों का जलसा है
एक सीना तना है बरसों बाद

 
भेड़िए सहमे हैं, कोई वारिस
शेरनी ने जना है बरसों बाद

दोनों मिलना तो चाहते हैं मगर
बीच में फिर अना है बरसों बाद

ज़ुल्म सहने से कब गुरेज़ हमें
हँसते रहना मना है बरसों बाद

सुना उस संगदिल का दामन भी
आँसुओं से सना है बरसों बाद

ख़ुद को ख़ुद से मिलाने की ख़ातिर
फिर कोई पुल बना है बरसों बाद

दिल की पगडण्डी पे निकले हैं ख़याल
याद का वन घना है बरसों बाद

Thursday, 13 May 2010

जाँ-ब-लब, तुझ नज़र : एक छोटी बह्र की तुक और ग़ज़ल

छोटी बह्र मेरी ज़ाती पसंद है। मुश्किल जो होती है, ऐसा सुना है। पहले भी मैंने छोटी बह्र में कई बार कही हैं ग़ज़लें, मगर अपने आप से एक वादा था कि पहले का कहा हुआ यहाँ नहीं लाऊँगा, और फिर इतनी छोटी बह्र में इसके पहले कहा भी सिर्फ़ एक बार है। अब ये रचना जनाब वीनस 'केशरी' से किया हुआ वादा भी है, और एक तजुर्बा भी, इसी में तुकबन्दी भी है और ग़ज़ल भी-
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हम इधर
दम उधर


बेवजह
ग़म-न-कर


यूँ न फिर
दर-ब-दर


हौसला
रख मगर


अर्श ला
फ़र्श पर


बस ज़रा
रख सबर


चुन नई
रहगुज़र


अब सुकूँ
अब सफ़र


रोज़ जी
रोज़ मर


जाँ-ब-लब
तुझ नज़र


फ़ितनागर
बे-ज़रर


बेख़बर
अब-न-डर


देख ले
भर नज़र


दर्द को
प्यार कर


क्या अगर
क्या मगर


रञ्जिशें
तर्क कर


ला दुआ-
में असर


है न "वो"
जल्वागर


बन्दे-ग़म
बख़्तवर


दश्ते-दिल
बे-शजर


तिश्नालब
हर लहर


चश्मो-रुख़
तर-ब-तर


तेग़ो-तंज़
बे-असर


इर्स-ए-इश्क़
जाम:दर


अश्क़ो-वक़्त
बख़्यागर

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अर्श = आकाश, आस्माँ, ऊपरवाला
जाँ-ब-लब = जब जान होठों तक चली आए, जान निकलने ही वाली हो
तुझ नज़र = (प्राचीन उर्दू प्रयोग) तेरी निगाह पड़ने से, (या) तुझको समर्पित
फ़ितनागर = साज़िशी, लोगों को भड़का कर उपद्रव / दंगा कराने वाला, षड्यंत्रकारी
(यहाँ 'त' आधा होना चाहिए मगर टाइप करने में जुड़ कर फ़ित्नागर हो जाता है)

बे-ज़रर = जिससे कोई हानि न पहुँचे, बेहद सीधा-सादा
रञ्जिश = वैमनस्य, नाराज़गी, ख़फ़गी, दुश्मनी
तर्क = परित्याग, छोड़ना
जल्व:गर = प्रकट, रूनुमा
बन्दे-ग़म = प्रेम का फ़ंदा, दु:ख का फ़ंदा (यहाँ अर्थ है - प्रेम के फंदे में [फँसा हुआ है जो]
बख़्तवर = सौभाग्यशाली, ख़ुशनसीब, बख़्तयार
दश्ते-दिल = हृदय का वन (जंगल)
शजर = पेड़, वृक्ष
तिश्नालब = प्यासे होंठ वाला/वाली
चश्मो-रुख़ = आँखें और गाल
तेग़ो-तंज़ = तलवार और ताने
अश्क़ो-वक़्त = आँसू और समय
इर्स-ए-इश्क़ ; इर्स = परम्परा, पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाली परम्परा, इर्से-इश्क़ = प्रेम की परम्परा
जाम:दर = कपड़े फाड़ने वाला; शोकातिरेक से या पागलपन, जुनून से
बख़्य:गर = तुरपाई करने वाला, सिलनेवाला, यहाँ (दिल के) घाव/ज़ख़्म भरने के अर्थ में प्रयुक्त

Tuesday, 11 May 2010

मेरी ख़ुश्बू (अब ग़ज़ल)


ज़िक्र होगा तेरा ख़ामोश मैं हो जाऊँगा
इसी ख़ामोशी को मैं उम्र भर निभाऊँगा

टूट सकता था तेरी झूठी क़सम सा मैं भी
ये क़सम ली है कि अब मैं न क़सम खाऊँगा

ख़ाब-दर-ख़ाब तेरी सहमी सी हर चाहत को
अक्स-बर-अक्स* मैं तामीर* कर दिखाऊँगा

क़तरा-क़तरा मैं तेरी प्यास पे बादल सा घिरूँ
होठों की सीप में गौहर* सी शफ़क* पाऊँगा

याद बनकर मैं चला आऊँगा तन्हाई में
लौटते वक़्त मैं पलकों से ढुलक जाऊँगा

मैं जो बिछड़ा तो बिछ्ड़ जाऊँगा गुज़रे पल सा
वक़्त जैसा तेरे हाथों से निकल जाऊँगा

वक़्त से आगे बहुत आगे निकलना है मुझे
ख़ुद से मिलने को अभी वक़्त न दे पाऊँगा

गले लग कर किसी मासूम गुज़ारिश* जैसा
बेबसी बन के मैं ख़ामोश रह न पाऊँगा

तू ख़ुशी की तरह दो पल में मुझे छोड़ भी दे
साथ सदमे सा तेरा उम्र भर निभाऊँगा

मैं आफ़ताब* का वारिस हूँ रात भर के लिए
ख़ला होते ही, मैं जुगनू सा चमक जाऊँगा

कोने-कोने से ये तारीक़ी* मिटा कर शब* भर
सुब्ह होगी तेरी, मैं चाँद सा ढल जाऊँगा

ज़र्रा-ज़र्रा* मेरी ख़ुश्बू से रहेगा आबाद
मैं लख़्त-लख़्त* हवाओं में बिखर जाऊँगा


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अमरेन्द्र जी! आप अब तो संतुष्ट हैं?
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अक्स-बर-अक्स = हर छवि या प्रतिबिम्ब
गौहर = मोती
शफ़क = उषा की चमक (यहाँ मोती की चमक)
ज़र्रा-ज़र्रा = कण-कण
लख़्त-लख़्त = टुकड़ा-टुकड़ा
तारीक़ी = अंधकार
शब = रात
तामीर = साकार, निर्मित
आफ़ताब = सूर्य
गुज़ारिश = प्रार्थना, इच्छा
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Saturday, 27 March 2010

मौसम : एक ग़ज़ल

गुलों  पे  तारी  हुआ जबसे  ख़ार का मौसम
कैसा गुमसुम सा है फ़स्ले बहार का मौसम

बेरुख़ी या अदा - कि हो के भी नहीं मौजूद
रू-ब-रू   होके  तेरे  इंतज़ार  का  मौसम !


सुकून ले गया अम्नो - क़रार का मौसम
उनके  वादों  पे  मेरे  ऐतबार  का  मौसम

हार - नूपुर - चूड़ी - टिकुली - सिंगार का मौसम
जाने  फिर  आए - न - आए ये प्यार का मौसम


साल-दर-साल दुखे दिल, हो जैसे कल की बात
कैसा  गुज़रा  था  मेरे  पहले  प्यार  का  मौसम

दग़ा-साज़िश-फ़रेब-झूठ-भितर्घात के बीच
याद आया बहुत माँ के दुलार का मौसम

हिमान्शु मोहन का गूगल प्रोफ़ाइल 
इब्तिदा-आग़ाज़-शुरूआत-पहल