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Wednesday, 27 October 2010

यहाँ हर सिम्त रिश्ते हैं जो अब मुश्किल निभाना है

बहुत आसाँ है रो देना, बहुत मुश्किल हँसाना है
कोई बिन बात हँस दे-लोग कहते हैं "दिवाना है"

हमारी ख़ुशमिज़ाजी पे तुनक-अंदाज़ वो उनका-
"तुम्हें क्यों हर किसी को हमने क्या बोला बताना है?"

मशालें ख़ूँ-ज़दा हाथों में, कमसिन पर शबाबों सी-
"चलो जल्दी चलें,फिर से किसी का घर जलाना है"

ये लाचारी कि किस्सागो हुए हम फ़ित्रतन यारो-
हमारी हर शिकायत पर वो कहते थे "फ़साना है"

किसी की दोस्ती हो तो कड़ी राहें भी कट जाएँ
यहाँ हर सिम्त रिश्ते हैं जो अब मुश्किल निभाना है

मेरी मजबूरियों को तुम ख़ुशी का नाम मत देना
यहाँ तुम भी नहीं हो अब बड़ा मुश्किल ज़माना है

वो मंज़र झील के,जंगल के,ख़ुश्बू के,चनारों के!
इन्हें भी आज ही कम्बख़्त शायद याद आना है

Friday, 27 August 2010

अश'आर चन्द यूँ भी

आज के हालात का मैं तब्सरा हूँ
ख़ुश-तबस्सुम-लब मगर अन्दर डरा हूँ

बस गए जो वो किसी शर्त छोड़ते ही नहीं
टूटा-फूटा सा पुराना मकान मेरा दिल!

इस राह पे चलना भी ख़ुद हासिले-सफ़र है
मंज़िल क़रीब है पर दुश्वार रहगुज़र है


आए हैं, मुँह फुलाए बैठे हैं
लगता है ख़ार खाए बैठे हैं
उधर लाल-आँखें, चढ़ी हैं भौंहें
हम इधर दिल बिछाए बैठे हैं

Friday, 20 August 2010

जागते रहिए ज़माने को जगाते रहिए

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जागते रहिए ज़माने को जगाते रहिए
ख़ैरियत-ख़ैरियत का शोर मचाते रहिए


वो जो सह लें, न कहें-उनको सहाते रहिए
वर्ना कह दें तो मियाँ ! चेहरा छुपाते रहिए


शम्मा यादों की मज़ारों पे जलाते रहिए
रोज़ इक बेबसी का जश्न मनाते रहिए


हुस्न गुस्ताख़ तमन्ना से दूर? नामुम्किन!
लाख बारूद को आतिश से बचाते रहिए


या तो खा जाइए, या रहिए निवाला बनते,
शाम के भोज का दस्तूर निभाते रहिए
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और शे'र हैं, अभी फुर्सत नहीं है टाइप करने की. बाद में लाऊँगा...

Friday, 6 August 2010

उन्होंने कह दिया अच्छा सुख़न है


ज़माना पेश हम से ढंग से आए-
ज़माने को भी कोई तो बताए!


यही सोचे हैं बैठे सर झुकाए
वो देखें आज क्या तोहमत लगाए

उन्होंने कह दिया अच्छा सुख़न है
मेरे अश'आर ख़ुश-ख़ुश लौट आए


मुहब्बत की भी कोई उम्र तय है?
अगर अब है तो फिर आए-न-आए!


झरे दिन जैसे मुट्ठी रेत की, या
उमर-मछली फिसल दरिया में जाए
………उमर-मछ्ली फिसल दरिया में जाए!

Tuesday, 20 July 2010

सब लोग ज़माने में सितमगर नहीं होते

यह भी मेरी एक पूर्व-प्रकाशित रचना ही है। यह अन्तर्जाल पर और एक साहित्यिक पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है। मैंने इसे इसलिए रख छोड़ा था कि जब कभी कुछ नया लेखन न हो पाए - तो ब्लॉग पर  तारतम्य बनाए रखने के लिए इसे आप की नज़रे-क़रम के हवाले किया जायगा। सो आज कर रहा हूँ:
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सब लोग ज़माने में सितमगर नहीं होते
क़द एक हो तो लोग बराबर नहीं होते


होते हैं मददगार - कई बार अजनबी
जिन लोगों से उम्मीद हो-अक्सर नहीं होते

उनको तलाश लेंगे करोड़ों के बीच हम
सारे गुलों के हाथ में पत्थर नहीं होते

क़ुदरत के इल्तिफ़ात से है शायरी का फ़न
सब शे'र कहने वाले भी शायर नहीं होते

हम ही नहीं ग़ज़ल से - हमीं से ग़ज़ल भी है
हम से दिवाने सारे सुख़नवर नहीं होते

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सितमगर: अत्याचारी
फ़न : हुनर, कला, योग्यता
इल्तिफ़ात : अनुग्रह, कृपा, प्रसन्नता (बहुवचन में)
सुख़नवर: बहुत अच्छा शायर, ग़ज़लसरा, ग़ज़लगो

Friday, 16 July 2010

क्या जाने

एक छोटी सी रुबाई:
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अदा की चोट - अदा क्या जाने
हया क्या है, भला वो क्या जाने
"अदा-वफ़ा-हया इक संग चहिए"-
ख़ुद को समझे हो क्या ख़ुदा जाने!

Thursday, 15 July 2010

शरीफ़ लोग आजकल वाले

सारे क़िस्से फ़रेब-छल वाले
शरीफ़ लोग आजकल वाले


शहर में सारे ऐब जंगल के
और शर्मिन्दा हैं जंगलवाले


हैं तो नाराज़,मगर कहते नहीं
नाते-रिश्ते प्रपञ्च-छल वाले


ज़हर उगलें, हमें क़ुबूल नहीं
पी लिये जाम हलाहल वाले


वफ़ा-ख़ुलूस-जुनूँ-सच-ईमाँ
अपने भी तौर हैं पागलवाले


हम नहीं झोंपड़ी-महल वाले
ठिकाने ढूँढे हैं मक़्तल वाले


वही तेवर, वही तिरछी चितवन
घूरते नैन भी काजल वाले


एक 'छ्म' और दिवाना घायल-
जाने कब समझेंगे पायल वाले!


वायदे झूठे वही 'कल' वाले
सारे अन्दाज़ हैं ग़ज़ल वाले
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एक मतला, एक हुस्ने-मतला का चलन तो आम है; मगर यहाँ काफ़िए की तंगी न थी, रदीफ़ भी ख़फ़ीफ़ न थी सो कई शे'र हो गए मतले के रंग में। अब क्या करूँ?
जो मक़्ता की जगह कब्ज़ाए हुए है - उस शे'र से ग़ज़ल कहनी शुरू हुई थी।
आजकल व्यस्तता ज़्यादा है - नए कलाम नहीं हैं ये। ये सब गज़लें ड्राफ़्ट में थीं, मार्च-अप्रैल में कह ली गयी थीं, शाया अब हो रही हैं।

Thursday, 8 July 2010

रुबाई का मौसम : दिल से दिल को आते हैं, क्या अजीब रस्ते हैं

और आज बारी है रुबाई की
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इश्क़ ने जब कभी आँखों को रुलाया होगा
सारा इल्ज़ाम इसी दिल पे तो आया होगा
सुन के गाली भी इस भरम में मुस्कराते हैं
सिवा तुम्हारे इन्हें किसने बुलाया होगा

रात से पहले जैसे शाम का नाम आता है
मौत से पहले यूँ ही राम-राम आता है
लोग छुप-छुप के आने वाले को अब क्या पूछें
बात ये है के अब वो सरेआम आता है

सब ये कहते हैं हर इन्साँ में ख़ुदा होता है
किससे पूछूँ के ये इन्सान कहाँ होता है
कल तो दुश्मन को भी महबूब समझते थे मगर
अब मुहब्बत से अदावत का गुमाँ होता है

नींद अब आजकल फ़रार है क्यूँ
ज़िंदगी इतनी ख़ुशगवार है क्यूँ
ख़ुद पे भी इस क़दर यक़ीन नहीं
जाने फिर तुझपे ऐतबार है क्यूँ

जब से वो बाग़बाँ हुए यारो
सारे जंगल धुआँ हुए यारो
शौक़े-तामीरे-शह्र ये उनका
हम तो बेआशियाँ हुए यारो

शुरू-शुरू में तड़प बेशुमार होती है
कभी तक़रार कभी ऐतबार होता है
तीसरे दौर में जब दर्द से ऊब होती है
दर-हक़ीक़त वो प्यार होता है

नज़्म कहना मेरी आदत तो नहीं
ग़ज़ल कहने की ज़रूरत तो नहीं
वो भी कतराने लगे हैं हमसे
कहीं उनको भी मुहब्बत तो नहीं

यूँ तो आँख के बादल सौ तरह बरसते हैं
बूँद-बूँद को दिल के दश्त क्यूँ तरसते हैं
सायबान वीराँ है, कारोबारे-अश्काँ है
दिल से दिल को आते हैं क्या अजीब रस्ते हैं

हरेक शाम बड़ी ख़ास शाम होती है
सुबह की उम्र इसी दम तमाम होती है
ज़िन्दगी ज़िन्दगी के इंतज़ाम में गुज़री
मौत तो और बड़ा ताम-झाम होती है

Tuesday, 6 July 2010

वक़्त बदलते देखा

एक अजीब सी बात हो रही है। प्रशंसक होते हैं लोग रचनाओं के, रचनाकारों के या कलाकारों के (अमूमन)। एक प्रशंसक का अंदाज़ कुछ ऐसा है प्रशंसा का, मेरे इस ब्लॉग पर - कि मैं उसके प्रशंसा करने के तरीक़े का प्रशंसक बन गया हूँ।
सीखूँगा (ज़रूर सीख लूँगा) अपने इस प्रशंसक से ये अन्दाज़, मगर आज ये रचना उसी प्रशंसक को समर्पित कर रहा हूँ, स्नेह और शुभेच्छाओं सहित -

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हमने सूरज कभी उगते कभी ढलते देखा
आस्मानों का यहाँ वक़्त बदलते देखा

कमसिनी में उन्हें इक गुल पे मचलते देखा
और फिर फूल दिया जाना भी खलते देखा

जिनका हर हुक्म चला,सिक्का चला,बात चली
उन्हें पैदल भी अकेले यहीं चलते देखा

अब्र में पानी था कि आग जो अबके बरसी
धरा सुलगी, उधर आकाश उबलते देखा

ग़ुलाब गालों पे खिल-खिल के खिलाने वाले!
तुझे कलियों को दुपट्टे में मसलते देखा

Friday, 2 July 2010

आशिकी अपनी बेपढ़ी

ज़िन्दगी धूप थी कड़ी
ख़ुशनुमा एक-दो घड़ी

की गईं मुश्किलें खड़ी-
हिम्मतें ख़ुद हुईं बड़ी

ज़िन्दगी इस क़दर सहल !
कुछ यक़ीनन है गड़बड़ी

रात रूमानी वायदा -
सुब्ह ऑफ़िस की हड़बड़ी

नज़र-ए-आशिक तुनकमिज़ाज
जब मिली - तब कहीं लड़ी

दिल का ले-ले के इम्तेहाँ-
रो दी बरसात की झड़ी

ग़म अमावस की रात से-
ख़ुशी हाथों की फुलझड़ी

मुस्कराते हों सब अगर-
नज़र देखो कहाँ गड़ी

संग लाएँ वो फ़स्ले-गुल
फेर कर जादुई छड़ी

कुछ तमन्ना भी अपनी कम,
कुछ ज़रूरत नहीं पड़ी

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और ये शे'र इश्क़े-हक़ीक़ी में अर्ज़ है:
"हरेक शै में उसका नूर,
सबमें रू-ए-ख़ुदा जड़ी"


ये एक और शे'र पैदाइशी आशिक़ों के लिए अर्ज़ है :
(दर-अस्ल यही वो शे'र है जिससे इस ग़ज़ल का आग़ाज़ हुआ था):
हुस्न उनका लुग़त जदीद
आशिक़ी अपनी बेपढ़ी
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लुग़त = शब्दकोष
जदीद = आधुनिक, नवीनतम

Monday, 28 June 2010

बदलते मौसमों की ज़ात की बात

बदलते मौसमों की ज़ात की बात
धूप में ख़ुशनुमा बरसात की बात


दिन भी सूरज सा दहकता अंगार
रात भी सुलगे से हालात की बात


अपनी ख़ातिर थी वही काम की बात
टाल दी आपने जज़्बात की बात


इश्क़ है सब्र - हुस्न बेचैनी
कशिश दोनों की-करामात की बात


"कोई आ जायगा…" - "तो क्या!" पे ख़तम-
हर अधूरी सी मुलाक़ात की बात


चाँद बातूनी है मुँह खोल न दे -
बात चल निकले न फिर बात-की-बात


कड़े पहरों से गुमशुदा होकर -
मिली अख़बार में फिर रात की बात

Friday, 25 June 2010

मैं भी हूँ (ग़ज़ल)

यह नेट पर पूर्वप्रकाशित रचना है - अनुभूति पर - पूर्णिमा वर्मन जी के सौजन्य से। आज आप लोगों की सेवा में प्रस्तुत है, सादर:
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बाक़ी-बाक़ी सी प्यास मैं भी हूँ
गो उफ़नता गिलास मैं भी हूँ

वो अकेला दरख़्त यादों में गुम
उसी के आस-पास मैं भी हूँ

हमक़दम वक़्त के बदलता रहा
अब ज़रा बदहवास मैं भी हूं

मेरे होठों पे तबस्सुम ही सही,
दोस्त मेरे! उदास मैं भी हूँ

आइनों में भी आपका चेहरा!
आपके हमशनास मैं भी हूँ।

ज़ुह्द हो या उसूफ़े-शौक़ का दौर
मह्वे-तश्बीशो-यास मैं भी हूँ

उसकी यादों का बक्स ज़ंगशुदा
इक पुराना लिबास मैं भी हूँ
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तबस्सुम: मुस्कान
मह्वे-तश्बीशो-यास : निराशा और चिन्ता के बीच,
मह्व : बीच में
तश्बीश: फ़िक्र, तरद्दुद, परेशानी
यास: निराशा
हमशनास : उसी सूरत/पहचान वाला, हमशक्ल, हू-ब-हू
ज़ुह्द: संयम, आत्मनिग्रह, अपने पे क़ाबू रखना
उसूफ़े-शौक़: लिप्सा का उफ़ान, भोग-विलास की तीव्रता

Monday, 21 June 2010

लोगों को नींद देर रात तक नहीं आती

शे'र ख़ुद मिट गया ग़ज़ल होकर
प्रश्न शर्मिंदा रहा - हल होकर

बात ये है कि कभी कहा था -
"जबसे मेरा अफ़साना शहर में हुआ है आम
लोगों को नींद देर रात तक नहीं आती
"

कल ख़्याल आया कि क्यों न इसे ग़ज़ल की शक्ल दी जाए! सो कुछ बना तो - मगर वो शे'र न रहा। अब पसोपेश के तसव्वुर में हूँ - इसे किस शक्ल में जीने दिया जाए - शे'र को जो 'मदरप्लाण्ट' है, या नए अश'आर को जो नवांकुर हैं?
फ़िलहाल तो सोच में ही हूँ।
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होठों पे दिल-ज़ेहन की बात तक नहीं आती
उनकी कोई भी चाल-मात तक नहीं आती

अपनी कोई साज़िश भी घात तक नहीं आती
जाँ-बख़्शी* भी उनकी हयात* तक नहीं आती

हैं काम भलाई के या ऐयारी का आलम
दाएँ की ख़बर बाएँ हाथ तक नहीं आती#

जबसे मेरा अफ़साना शहर में हुआ है आम
ख़ुश-नाचते-गाते बरात तक नहीं आती

सूरज भी लगे जैसे न सोया हो रात भर
ख़ुद रात भी - अब देर रात तक नहीं आती

जिनके बिना इक दिन कभी जीना मुहाल था
ता'ज्जुब है कि अब उनकी याद तक नहीं आती

तन्हाइयाँ हैं, बस! न ख़ुशी है - न कोई ग़म
बेकैफ़* उम्र क्यूँ वफ़ात* तक नहीं आती
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जाँ-बख़्शी = जीवन-दान
हयात = जीवन, ज़िन्दगी
बे-कैफ़ = आनन्द-रहित, बेमज़ा, जब सारे नशे उतर चुके हों
वफ़ात = मृत्यु, मोक्ष, मुक्ति
#ईसा का संदेश :  "भलाई का काम इस तरह करो कि दाएँ हाथ को बाएँ हाथ की ख़बर न हो""

Saturday, 19 June 2010

बातों बातों में चली आप की बात : लोग सब समझे क़ायनात की बात

कभी चुप हैं, तो कभी आप की बात
और फिर आपकी - बस आपकी बात
 
फूल-तितली-बहार-झरनों के मिस
बातों-बातों में चली आपकी बात

लोग सब समझे क़ायनात की बात
हम तो करते रहे बस आपकी बात

जाने क्या-क्या कहा, किस-किस से कहा
आप से कैसे कहें आप की बात

कहें दीवाना, जो हँसते हैं - हँसें
लोग क्या जानें - क्या है आपकी बात

Thursday, 17 June 2010

दहन (ग़ज़ल) : चित्र बोलोजीडॉट्नेट से साभार

एक पूर्वप्रकाशित रचना है 'दहन'। यह नेट पर मेरी प्रथम हिन्दी कविता थी - जो बोलोजीडॉट्नेट पर 2000 में प्रकाशित हुई। फिर दोबारा नहीं लिखा उस जालस्थल पर, क्योंकि उन्होंने मेरी कविता को संपादित कर दिया - प्रकाशन के पूर्व और उससे कविता मर गयी। यह मेरी स्वीकृति के बिना था और मेरी समझ में कविता या ग़ज़ल में सुधार करने का अधिकार मूल रचनाकार के अतिरिक्त किसी को नहीं होता।
यहीं पूर्णिमा वर्मन जी से परिचय हुआ और उस समय कुछ हिन्दी के लिए करने का जोश कुछ दिन चला। फिर समय ने करवट बदली तो हमने एक लम्बी चुप्पी साध ली। अब हम नौसिखिए हो गए,मज़ा आ रहा है।
दहन

मासूम मुहब्बत से कई लोग जल गए
हम जल के यूँ मिले के सभी हाथ मल गए


दिल में रहा न जोश तो दिल-दिल नहीं रहे
वो दिल ही क्या जो अक़्ल के हाथों सँभल गए


तक़्दीर की बुलन्दी भी लोगों को खल गयी
निकला ज़रूर दम, मगर अरमाँ निकल गए


उनको गिला - के वैसे भी हम जी तो न पाते
ये तो उन्हें जलाने को हम साथ जल गए


माचिस की तीलियों की तरह उम्र क्या ढली
सब जात-पाँत ख़ाक़ की सूरत में ढल गए



जो बन सके मशाल - मेरे साथ चल पड़े
जो डर गए, वो रुक-के - समझे हमको छल गए


जब तक जिए मुरझाए से घुट-घुट के साँस-साँस
जल कर लगा के हम खिले और बन कँवल गए


आशिक़ ये समझे जलने से दुनिया बदल गई
दुनिया ये समझी जीने के मानी बदल गए


दुनिया की इस सराय में सारे हैं मुसाफ़िर
कल आए थे-कुछ आज, तो कुछ लोग कल गए
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और आख़िर में एक शे'र तस्वीर की तारीफ़ में भी -

"तस्वीर ख़ुद ग़ज़ल है के नज़रों का इक फ़रेब
इतना हसीं के जलने को लाखों मचल गए!"

Friday, 11 June 2010

लगा माँ की मुझे दुआ सा कुछ

शायरी - ग़ज़लें, नज़्में क्या-क्या कुछ
लगा माँ की मुझे दुआ सा कुछ

जाने जुगनू कि हौसले के चराग़
यादों-यादों जला बुझा सा कुछ

फिर से कुछ सोच लिया शाम ढले
हुआ फिर दिल से लापता सा कुछ

बेरूख़ी भी है, और ख़फ़ा भी नहीं-
ज़ुल्म है, पर लगे अदा सा कुछ

बूढ़े पत्तों की बेबसी कि उन्हें
कहे पतझड़ भी बेवफ़ा सा कुछ

अब के सावन में घटा के अंदाज़
साथ रहते हुए जुदा सा कुछ

कुछ कहा हमने - लोग कुछ समझे
और हर शख़्स फिर ख़फ़ा सा कुछ

जुड़ते जाते हैं लाखों मंसूबे
दिल ही दिल में है टूटता सा कुछ

मुझसे पूछी है मेरी राय तो अब
देख ले तू भी आइना सा कुछ
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अलहदा -

और अश'आर मैं कह सकता था
पर है अब मुझमें अनमना सा कुछ

इश्क़ का फाड़ के ख़त गुस्से में
हुस्न अब फिर है मेहरबाँ सा कुछ

तेरी रहमत पे शक़ नहीं, लेकिन
अपनी बर्बादी - क़ायदा सा कुछ

हमको सारे तेरे इल्ज़ाम क़ुबूल
और फिर भी तुझे गिला सा कुछ!

"एक बीमार भी बाक़ी न बचे"
बँटा फिर ज़हर या दवा सा कुछ

हम ये समझे - कि कुछ नहीं समझे
ज़माना समझा जाने क्या-क्या कुछ

Wednesday, 9 June 2010

कितना वो पानी में है

ख़ुल्द में कब वो मज़ा जो दुनिया-ए-फ़ानी में है
होश क्या जाने कि क्या-क्या है जो नादानी में है


हौसलों का, हिम्मतों का इम्तेहाँ है ज़िन्दगी
जो मज़ा मुश्क़िल में है, वो ख़ाक़ आसानी में है


जो सदा मँझधार से, लौटा भँवर को जीतकर;
साहिलों पर बहस अब तक, कितना वो पानी में है


जीना बिन-ख़्वाहिश के - या लेकर अधूरी हसरतें
इत्तिक़ा दर-अस्ल ख़ुद ख़्वाहिश की तुग़यानी में है


ख़ुदपरस्ती में जिया, ख़ुद के लिए मरता रहा
ख़्वाहिशे-जन्नत में वो भी सफ़हे-क़ुर्बानी में है
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ख़ुल्द = स्वर्ग, जन्नत
फ़ानी = नश्वर, नाशवान
साहिल = किनारा, तट
इत्तिक़ा = संयम, इन्द्रिय निग्रह
तुग़यानी = बाढ़, उफ़ान
ख़्वाहिशे-जन्नत = स्वर्ग की इच्छा
सफ़हे-क़ुर्बानी = क़ुर्बानी / बलिदान देने के लिए लगी हुई क़तार

Saturday, 5 June 2010

लोग पत्थर उठाए फिरते हैं!

लोग पत्थर उठाए फिरते हैं
और हम सर उठाए फिरते हैं

दुश्मनों से गिला भला कैसा
दोस्त ख़ंजर उठाए फिरते हैं

जब कहे बादबाँ* - "चलो", चल दें!
हम भी लंगर उठाए फिरते हैं

ग़ैर पे उँगली उठे या न उठे-
हम पे अक्सर उठाए फिरते हैं

आस्माँ तू उठा उन्हें जो तुझे-
रोज़ सर पर उठाए फिरते हैं
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बादबाँ = पाल के सहारे चलने वाली नौका का नाविक-निर्देशक (कैप्टेन : आज के जलयान-पोत-नौका का)
यहाँ भावार्थ ऊपर से बुलावा आने और उसके लिए आसक्ति का लंगर उठाकर तैयार बैठे होने का है।

Friday, 4 June 2010

दिल ये नादाँ फिर दिवाना हो गया !

उस गली में आना-जाना हो गया
दिल का यारो आबो-दाना हो गया


आपसे सुनने-सुनाने की सुनी-
किस क़दर दुश्मन ज़माना हो गया


कोई तहज़ीबन भी मुस्काया अगर
दिल ये नादाँ-फिर दिवाना हो गया


ये इबादत - उसके नक़्शे-पा* दिखे
फ़र्ज़ अपना सर झुकाना हो गया


सिर्फ़ दो दिन आपसे मिलते हुए
जाने कब रिश्ता पुराना हो गया
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इबादत = उपासना, पूजा
नक़्शे-पा = पद-चिह्न
तहज़ीबन = औपचारिकता-वश, शिष्टाचार-वश

Sunday, 30 May 2010

साक़िया और पिला, और पिला

साक़िया और पिला, और पिला
सितम कम गुज़रे अभी और जिला

कोई शिक्वा, न शिकायत, न गिला
ऐसे देते हैं मुहब्बत का सिला !

इरादतन कुरेदता हो जो ज़ख़्म,
ऐसा दुनिया में पराया न मिला

हमने उसको बना लिया माली
जिसकी मर्ज़ी बिना पत्ता न हिला

वही रिमझिम है - वही इन्द्रधनुष
या ख़ुदा याद फिर उनकी न दिला