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Friday 6 August 2010

उन्होंने कह दिया अच्छा सुख़न है


ज़माना पेश हम से ढंग से आए-
ज़माने को भी कोई तो बताए!


यही सोचे हैं बैठे सर झुकाए
वो देखें आज क्या तोहमत लगाए

उन्होंने कह दिया अच्छा सुख़न है
मेरे अश'आर ख़ुश-ख़ुश लौट आए


मुहब्बत की भी कोई उम्र तय है?
अगर अब है तो फिर आए-न-आए!


झरे दिन जैसे मुट्ठी रेत की, या
उमर-मछली फिसल दरिया में जाए
………उमर-मछ्ली फिसल दरिया में जाए!

12 comments:

Rajeev Bharol said...

वाह. बहुत अच्छी गज़ल.
"उन्होंने कह दिया अच्छा सुख़न है
मेरे अश'आर ख़ुश-ख़ुश लौट आए"

बहुत अच्छा लगा..

नीरज गोस्वामी said...

बहुत बेहतरीन अशआर...वाह...वा...दाद कबूल कीजिये...
नीरज

khushi said...

bahut khoob!!! nae likhne walon ko prerna dete rahen....

khushi said...

bahut khoob!!! nae likhne walon ko prerna dete rahen....

प्रवीण पाण्डेय said...

मन में रह रह के हूँक उठती है,
मन यूँ बढ़े नहीं, एक बच्चा हो जाये।

Virendra Singh Chauhan said...

Kya baat sir ji.............barsaat men aap bhi Romantic ho gaye. Post bahut achh lagi sir.

सर्वत एम० said...

बहुत दिनों बाद आया हूँ, गजल देखकर तबीयत खुश हो गयी. आप वाकई मेहनत कर रहे हैं यह दिखाई देता है मगर जितनी मेहनत होंनी चाहिए उतनी हो नहीं रही है या हो नहीं पा रही है. आपके पास इसका उत्तर होगा, कई बहाने होंगे---उम्र का तकाज़ा, दफ्तर की उलझनें, बच्चों की ज़िम्मेदारी, सेहत, शिक्षा और जाने क्या क्या.
फिलहाल गजल बहुत अच्छी है लेकिन मतला? कुछ न कहना ही बेहतर है, क्यों क्या ख्याल है?

Sonal said...

यही सोचे हैं बैठे सर झुकाए
वो देखें आज क्या तोहमत लगाए
bahut hi sundar..

Meri Nayi Kavita par aapke Comments ka intzar rahega.....

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Himanshu Mohan said...

आप सबका शुक्रिया।
@सर्वत साहब, आप आते नहीं थे तो कुछ भी ठेला जाता था. और बहाने नहीं बनाने कोई - बस कबूला जाना शेष है कि मैं गज़ल पर वाकई कभी कोई मेहनत शायद ही करता होऊंगा! मैं तो सहज - मनमाफिक जो बना कहते - सो कहा के निकल लेता हूं.
कभी ही कभी ऐसा होता है कि जो कहना है - वाह शेर नहीं बंध रहा - तो फिर जब कहा जाता है तबा ही कहता हूं. एक बार तो एक शे'र गज़ल बनने में पूरे तीन साल ले गया - और जिस दिन मतले के सिवा दूसरा शे'र कहा गया - उसी दिन पूरी गज़ल!
खैर, आपने टोका तो अभी मतला बदले देता हूं...
अब जब आएं तो देखिएगा.

दिगम्बर नासवा said...

मुहब्बत की भी कोई उम्र तय है?
अगर अब है तो फिर आए-न-आए!

बहुत खूब हिमांशु जी .... लाजवाब ग़ज़ल कही है और ये शेर तो कमाल का है ... मुहब्बत की कोई उम्र नही होती ...

आशीष/ ASHISH said...

बाऊ जी,
नमस्ते!
दूसरे, तीसरे और चौथे शेर में स्वाद आ गया!
बाकी के लिए, अंगूर खट्टे हैं! समझ में नहीं आये!
हा हा हा....
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अब टैक्स फ्री!
फिल्लौर फ़िल्म फेस्टिवल!!!!!

Divya said...

bahut sundar rachna !