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Monday 28 June 2010

बदलते मौसमों की ज़ात की बात

बदलते मौसमों की ज़ात की बात
धूप में ख़ुशनुमा बरसात की बात


दिन भी सूरज सा दहकता अंगार
रात भी सुलगे से हालात की बात


अपनी ख़ातिर थी वही काम की बात
टाल दी आपने जज़्बात की बात


इश्क़ है सब्र - हुस्न बेचैनी
कशिश दोनों की-करामात की बात


"कोई आ जायगा…" - "तो क्या!" पे ख़तम-
हर अधूरी सी मुलाक़ात की बात


चाँद बातूनी है मुँह खोल न दे -
बात चल निकले न फिर बात-की-बात


कड़े पहरों से गुमशुदा होकर -
मिली अख़बार में फिर रात की बात

Friday 25 June 2010

मैं भी हूँ (ग़ज़ल)

यह नेट पर पूर्वप्रकाशित रचना है - अनुभूति पर - पूर्णिमा वर्मन जी के सौजन्य से। आज आप लोगों की सेवा में प्रस्तुत है, सादर:
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बाक़ी-बाक़ी सी प्यास मैं भी हूँ
गो उफ़नता गिलास मैं भी हूँ

वो अकेला दरख़्त यादों में गुम
उसी के आस-पास मैं भी हूँ

हमक़दम वक़्त के बदलता रहा
अब ज़रा बदहवास मैं भी हूं

मेरे होठों पे तबस्सुम ही सही,
दोस्त मेरे! उदास मैं भी हूँ

आइनों में भी आपका चेहरा!
आपके हमशनास मैं भी हूँ।

ज़ुह्द हो या उसूफ़े-शौक़ का दौर
मह्वे-तश्बीशो-यास मैं भी हूँ

उसकी यादों का बक्स ज़ंगशुदा
इक पुराना लिबास मैं भी हूँ
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तबस्सुम: मुस्कान
मह्वे-तश्बीशो-यास : निराशा और चिन्ता के बीच,
मह्व : बीच में
तश्बीश: फ़िक्र, तरद्दुद, परेशानी
यास: निराशा
हमशनास : उसी सूरत/पहचान वाला, हमशक्ल, हू-ब-हू
ज़ुह्द: संयम, आत्मनिग्रह, अपने पे क़ाबू रखना
उसूफ़े-शौक़: लिप्सा का उफ़ान, भोग-विलास की तीव्रता

Monday 21 June 2010

लोगों को नींद देर रात तक नहीं आती

शे'र ख़ुद मिट गया ग़ज़ल होकर
प्रश्न शर्मिंदा रहा - हल होकर

बात ये है कि कभी कहा था -
"जबसे मेरा अफ़साना शहर में हुआ है आम
लोगों को नींद देर रात तक नहीं आती
"

कल ख़्याल आया कि क्यों न इसे ग़ज़ल की शक्ल दी जाए! सो कुछ बना तो - मगर वो शे'र न रहा। अब पसोपेश के तसव्वुर में हूँ - इसे किस शक्ल में जीने दिया जाए - शे'र को जो 'मदरप्लाण्ट' है, या नए अश'आर को जो नवांकुर हैं?
फ़िलहाल तो सोच में ही हूँ।
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होठों पे दिल-ज़ेहन की बात तक नहीं आती
उनकी कोई भी चाल-मात तक नहीं आती

अपनी कोई साज़िश भी घात तक नहीं आती
जाँ-बख़्शी* भी उनकी हयात* तक नहीं आती

हैं काम भलाई के या ऐयारी का आलम
दाएँ की ख़बर बाएँ हाथ तक नहीं आती#

जबसे मेरा अफ़साना शहर में हुआ है आम
ख़ुश-नाचते-गाते बरात तक नहीं आती

सूरज भी लगे जैसे न सोया हो रात भर
ख़ुद रात भी - अब देर रात तक नहीं आती

जिनके बिना इक दिन कभी जीना मुहाल था
ता'ज्जुब है कि अब उनकी याद तक नहीं आती

तन्हाइयाँ हैं, बस! न ख़ुशी है - न कोई ग़म
बेकैफ़* उम्र क्यूँ वफ़ात* तक नहीं आती
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जाँ-बख़्शी = जीवन-दान
हयात = जीवन, ज़िन्दगी
बे-कैफ़ = आनन्द-रहित, बेमज़ा, जब सारे नशे उतर चुके हों
वफ़ात = मृत्यु, मोक्ष, मुक्ति
#ईसा का संदेश :  "भलाई का काम इस तरह करो कि दाएँ हाथ को बाएँ हाथ की ख़बर न हो""

Saturday 19 June 2010

बातों बातों में चली आप की बात : लोग सब समझे क़ायनात की बात

कभी चुप हैं, तो कभी आप की बात
और फिर आपकी - बस आपकी बात
 
फूल-तितली-बहार-झरनों के मिस
बातों-बातों में चली आपकी बात

लोग सब समझे क़ायनात की बात
हम तो करते रहे बस आपकी बात

जाने क्या-क्या कहा, किस-किस से कहा
आप से कैसे कहें आप की बात

कहें दीवाना, जो हँसते हैं - हँसें
लोग क्या जानें - क्या है आपकी बात

Thursday 17 June 2010

दहन (ग़ज़ल) : चित्र बोलोजीडॉट्नेट से साभार

एक पूर्वप्रकाशित रचना है 'दहन'। यह नेट पर मेरी प्रथम हिन्दी कविता थी - जो बोलोजीडॉट्नेट पर 2000 में प्रकाशित हुई। फिर दोबारा नहीं लिखा उस जालस्थल पर, क्योंकि उन्होंने मेरी कविता को संपादित कर दिया - प्रकाशन के पूर्व और उससे कविता मर गयी। यह मेरी स्वीकृति के बिना था और मेरी समझ में कविता या ग़ज़ल में सुधार करने का अधिकार मूल रचनाकार के अतिरिक्त किसी को नहीं होता।
यहीं पूर्णिमा वर्मन जी से परिचय हुआ और उस समय कुछ हिन्दी के लिए करने का जोश कुछ दिन चला। फिर समय ने करवट बदली तो हमने एक लम्बी चुप्पी साध ली। अब हम नौसिखिए हो गए,मज़ा आ रहा है।
दहन

मासूम मुहब्बत से कई लोग जल गए
हम जल के यूँ मिले के सभी हाथ मल गए


दिल में रहा न जोश तो दिल-दिल नहीं रहे
वो दिल ही क्या जो अक़्ल के हाथों सँभल गए


तक़्दीर की बुलन्दी भी लोगों को खल गयी
निकला ज़रूर दम, मगर अरमाँ निकल गए


उनको गिला - के वैसे भी हम जी तो न पाते
ये तो उन्हें जलाने को हम साथ जल गए


माचिस की तीलियों की तरह उम्र क्या ढली
सब जात-पाँत ख़ाक़ की सूरत में ढल गए



जो बन सके मशाल - मेरे साथ चल पड़े
जो डर गए, वो रुक-के - समझे हमको छल गए


जब तक जिए मुरझाए से घुट-घुट के साँस-साँस
जल कर लगा के हम खिले और बन कँवल गए


आशिक़ ये समझे जलने से दुनिया बदल गई
दुनिया ये समझी जीने के मानी बदल गए


दुनिया की इस सराय में सारे हैं मुसाफ़िर
कल आए थे-कुछ आज, तो कुछ लोग कल गए
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और आख़िर में एक शे'र तस्वीर की तारीफ़ में भी -

"तस्वीर ख़ुद ग़ज़ल है के नज़रों का इक फ़रेब
इतना हसीं के जलने को लाखों मचल गए!"

Friday 11 June 2010

लगा माँ की मुझे दुआ सा कुछ

शायरी - ग़ज़लें, नज़्में क्या-क्या कुछ
लगा माँ की मुझे दुआ सा कुछ

जाने जुगनू कि हौसले के चराग़
यादों-यादों जला बुझा सा कुछ

फिर से कुछ सोच लिया शाम ढले
हुआ फिर दिल से लापता सा कुछ

बेरूख़ी भी है, और ख़फ़ा भी नहीं-
ज़ुल्म है, पर लगे अदा सा कुछ

बूढ़े पत्तों की बेबसी कि उन्हें
कहे पतझड़ भी बेवफ़ा सा कुछ

अब के सावन में घटा के अंदाज़
साथ रहते हुए जुदा सा कुछ

कुछ कहा हमने - लोग कुछ समझे
और हर शख़्स फिर ख़फ़ा सा कुछ

जुड़ते जाते हैं लाखों मंसूबे
दिल ही दिल में है टूटता सा कुछ

मुझसे पूछी है मेरी राय तो अब
देख ले तू भी आइना सा कुछ
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अलहदा -

और अश'आर मैं कह सकता था
पर है अब मुझमें अनमना सा कुछ

इश्क़ का फाड़ के ख़त गुस्से में
हुस्न अब फिर है मेहरबाँ सा कुछ

तेरी रहमत पे शक़ नहीं, लेकिन
अपनी बर्बादी - क़ायदा सा कुछ

हमको सारे तेरे इल्ज़ाम क़ुबूल
और फिर भी तुझे गिला सा कुछ!

"एक बीमार भी बाक़ी न बचे"
बँटा फिर ज़हर या दवा सा कुछ

हम ये समझे - कि कुछ नहीं समझे
ज़माना समझा जाने क्या-क्या कुछ

Wednesday 9 June 2010

कितना वो पानी में है

ख़ुल्द में कब वो मज़ा जो दुनिया-ए-फ़ानी में है
होश क्या जाने कि क्या-क्या है जो नादानी में है


हौसलों का, हिम्मतों का इम्तेहाँ है ज़िन्दगी
जो मज़ा मुश्क़िल में है, वो ख़ाक़ आसानी में है


जो सदा मँझधार से, लौटा भँवर को जीतकर;
साहिलों पर बहस अब तक, कितना वो पानी में है


जीना बिन-ख़्वाहिश के - या लेकर अधूरी हसरतें
इत्तिक़ा दर-अस्ल ख़ुद ख़्वाहिश की तुग़यानी में है


ख़ुदपरस्ती में जिया, ख़ुद के लिए मरता रहा
ख़्वाहिशे-जन्नत में वो भी सफ़हे-क़ुर्बानी में है
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ख़ुल्द = स्वर्ग, जन्नत
फ़ानी = नश्वर, नाशवान
साहिल = किनारा, तट
इत्तिक़ा = संयम, इन्द्रिय निग्रह
तुग़यानी = बाढ़, उफ़ान
ख़्वाहिशे-जन्नत = स्वर्ग की इच्छा
सफ़हे-क़ुर्बानी = क़ुर्बानी / बलिदान देने के लिए लगी हुई क़तार

Saturday 5 June 2010

लोग पत्थर उठाए फिरते हैं!

लोग पत्थर उठाए फिरते हैं
और हम सर उठाए फिरते हैं

दुश्मनों से गिला भला कैसा
दोस्त ख़ंजर उठाए फिरते हैं

जब कहे बादबाँ* - "चलो", चल दें!
हम भी लंगर उठाए फिरते हैं

ग़ैर पे उँगली उठे या न उठे-
हम पे अक्सर उठाए फिरते हैं

आस्माँ तू उठा उन्हें जो तुझे-
रोज़ सर पर उठाए फिरते हैं
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बादबाँ = पाल के सहारे चलने वाली नौका का नाविक-निर्देशक (कैप्टेन : आज के जलयान-पोत-नौका का)
यहाँ भावार्थ ऊपर से बुलावा आने और उसके लिए आसक्ति का लंगर उठाकर तैयार बैठे होने का है।

Friday 4 June 2010

दिल ये नादाँ फिर दिवाना हो गया !

उस गली में आना-जाना हो गया
दिल का यारो आबो-दाना हो गया


आपसे सुनने-सुनाने की सुनी-
किस क़दर दुश्मन ज़माना हो गया


कोई तहज़ीबन भी मुस्काया अगर
दिल ये नादाँ-फिर दिवाना हो गया


ये इबादत - उसके नक़्शे-पा* दिखे
फ़र्ज़ अपना सर झुकाना हो गया


सिर्फ़ दो दिन आपसे मिलते हुए
जाने कब रिश्ता पुराना हो गया
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इबादत = उपासना, पूजा
नक़्शे-पा = पद-चिह्न
तहज़ीबन = औपचारिकता-वश, शिष्टाचार-वश