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Wednesday, 31 March, 2010

मेरी ख़ुश्बू

ज़र्रा-ज़र्रा मेरी ख़ुश्बू से रहेगा आबाद
मैं लख़्त-लख़्त हवाओं में बिखर जाऊँगा

ज़र्रा-ज़र्रा   मेरी   ख़ुश्बू   से    रहेगा   आबाद

मैं लख़्त-लख़्त हवाओं में बिखर जाऊँगा

Sunday, 28 March, 2010

कल : एक ग़ज़ल

ज़िन्दगी  कल   रही, रही - न  रही !
बात का क्या कही, कही - न कही !

आँख में रोक मत ये दिल का ग़ुबार
कल ये गंगा  बही,  बही - न बही !

मैल दिल का हटा, उठा न दीवार
कल किसी से ढही, ढही - न ढही !

तेरी कुर्सी को सब हैं नतमस्तक
कल किसी ने सही, सही - न सही

अहम्  की  आज  फूँक  दे   लंका
कल ये तुझसे दही, दही - न दही !

हिमान्शु मोहन
इब्तिदा-आग़ाज़-शुरूआत-पहल

Saturday, 27 March, 2010

अच्छा लगा

फ़ेसबुक पर किसी प्रशंसक ने पिछले दिनों कहा कि -" विभागीय बातों - रेल से हट कर कुछ देखकर - अच्छा लगा"। बस जनाब, हम अपने शुकराने में जोश में आ गए और उनके कमेण्ट के जवाब में कुछ शे'र अर्ज़ कर दिए वहीं के वहीं। आज ख्याल आया कि क्यों न वो शेर आप सबकी नज़्र किए जाएँ? आख़िरश आप भी तो प्रोत्साहन देते हैं, और प्रोत्साहन देने की सिर्फ़ दो वज़ूहात हो सकती हैं - और दोनों भी हो सकती हैं - पहली कि आप को रचना अच्छी लगी, दूसरी - आप ख़ुद बहुत अच्छे इन्सान हैं और इसीलिए आपको अच्छाई नज़र आती है। वहाँ भी, जहाँ थोड़ी कम होती है। तो पेशे-नज़्र है -
"आप को अच्छा लगा ये जानकर अच्छा लगा।
क़द्रदाँ की क़द्र को पहचान कर अच्छा लगा

लोग क्या जानें किसी को क्या बुरा लग जाय क्यों;
कौन कब पूछे दोनाली तानकर-"अच्छा लगा?"

क़द्र है गुल की कभी खुश्बू से - रंगों से कभी
लायँगे हम और गुल ये ठानकर अच्छा लगा

रेल वाला हूँ, बहुत कुछ रेल सकता हूँ अभी
पर इशारा सिग्नलों का मानकर अच्छा लगा

ताज़ा-ताज़ा शे'र लाया हूँ कि फिर अच्छा लगे
वर्ना हमको ख़ाक जंगल छानकर अच्छा लगा
हिमान्शु मोहन
दस बहाने, इब्तिदा=आग़ाज़=शुरूआत=पहल

मौसम : एक ग़ज़ल

गुलों  पे  तारी  हुआ जबसे  ख़ार का मौसम
कैसा गुमसुम सा है फ़स्ले बहार का मौसम

बेरुख़ी या अदा - कि हो के भी नहीं मौजूद
रू-ब-रू   होके  तेरे  इंतज़ार  का  मौसम !


सुकून ले गया अम्नो - क़रार का मौसम
उनके  वादों  पे  मेरे  ऐतबार  का  मौसम

हार - नूपुर - चूड़ी - टिकुली - सिंगार का मौसम
जाने  फिर  आए - न - आए ये प्यार का मौसम


साल-दर-साल दुखे दिल, हो जैसे कल की बात
कैसा  गुज़रा  था  मेरे  पहले  प्यार  का  मौसम

दग़ा-साज़िश-फ़रेब-झूठ-भितर्घात के बीच
याद आया बहुत माँ के दुलार का मौसम

हिमान्शु मोहन का गूगल प्रोफ़ाइल 
इब्तिदा-आग़ाज़-शुरूआत-पहल

Friday, 26 March, 2010

दोहे

आज दोहों पर भी हाथ आज़माया है-

 


हरियाली व्यवहार में, मन में खिसके रेत
झुकने में अव्वल मगर, फूलें-फलें न बेंत







कटता शीशम देखकर, गुमसुम बूढ़ा नीम
धागा   चिटका   प्रेम   का,  रोया बैठ रहीम



 


मन का मोल चुका रही, कमल-पात की ओस
आँखों  भर   दौलत   मिली,  साँसों   भर   संतोष


जाने किसकी याद है, जाने किसकी बात
होठों पर कलियाँ खिलीं, आँखों में बारात


यह सशक्त विधा हिन्दी में अभिव्यक्ति की नैसर्गिक क्षमता को उसी तरह तराशती है जैसे उर्दू में शे'र। मज़ा लेकिन गज़ब है, दोनों का।

Saturday, 20 March, 2010

शुक्रिया

आप सबका शुक्रिया, सराहने और बढ़ावा देने के लिए। तो वह शेर भी पेश है जिसका मैंने शीर्षक के तौर पर इस्तेमाल किया था-
दर्दो-राहत, वस्लो-फ़ुरकत, होशो-वहशत क्या नहीं 
कौन कहता है कि रहने की जगह दुनिया नहीं ?
उम्मीद है कि दुनिया से आज़िज़ फ़लसफ़ेबाज़ शायरी के बजाय दुनिया के लिए लगाव का ये शे'अर भी आपको पसन्द आएगा।

Friday, 19 March, 2010

दर्दो राहत क्या नहीं!

लिखना मेरे लिए शौक़ भी है, और राहत भी।
मजबूरी तो कभी नहीं रहा मगर दर्द की शिद्दत बढ़ जाने पर मजबूरी ही बन जाता है।
यह कलाम मेरे नहीं हैं, दूसरों के हैं। दिल के क़रीब लगे तो याद रह गए।
याद रह गए तो दोहराने पर भी राहत देते हैं। तो मैंने सोचा कि ये राहत क्यों न आप सबसे बाँटी जाए?

याद इक ज़ख़्म बन गई है वर्ना
भूल जाने का कुछ खयाल तो था   (याद नहीं किसका है)

दुश्मनों से प्यार होता जाएगा
दोस्तों को आज़माते जाइए      (याद नहीं किसका है)

ज़िन्दगी के उदास लम्हों में
बेवफ़ा दोस्त याद आते हैं        (याद नहीं किसका है)

हमें कुछ काम अपने दोस्तों से आ पड़ा यानी
हमारे दोस्तों के बेवफ़ा होने का वक़्त आया (शायद इस्माइल मेरठी)

नाहक है गिला हमसे बेजा है शिकायत भी
हम लौट के आ जाते आवाज़ तो दी होती   (याद नहीं किसका है)

मेह्रबाँ होके बुला लो मुझे चाहे जिस वक़्त
मैं गया वक़्त नहीं हूँ के फिर आ भी न सकूँ  (ग़ालिब)

ज़ह्र मिलता ही नहीं मुझको सितमगर वर्ना
क्या कसम है तेरे मिलने की-के खा भी न सकूँ (ग़ालिब)

कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी!
यों   कोई    बेवफ़ा    नहीं   होता      (बशीर"बद्र")

गरज़ के काट लिए ज़िन्दगी के दिन ऐ दोस्त!
वो   तेरी  याद   में   हों   या   उसे  भुलाने   में    (फ़िराक़)

तुम मेरे पास होते हो गोया
जब कोई दूसरा नहीं होता    (मोमिन)

कुछ इस अदा से आज वो पहलूनशीं रहे
जब तक हमारे पास रहे हम नहीं रहे

आपकी मख़्मूर आँखों की कसम
मेरी मैख़्वारी अभी तक राज़ है    (याद नहीं किसका है)

उनसे ज़रूर मिलना, सलीके के लोग हैं
सर भी कलम करेंगे बड़े एहतराम से  (बशीर"बद्र")

अगर दिखाइए चाबुक सलाम करते हैं
ये शेर वो हैं जो सर्कस में काम करते हैं     (राहत इन्दौरी)

ज़िन्दगी में जो हुआ अच्छा हुआ
जाने दे, मत पूछ कैसे क्या हुआ        (याद नहीं किसका है)

ये इमारत तो इबादतगाह थी
इस जगह इक मैक़दा था क्या हुआ    (नामालूम)

वो बड़ा रहीमो करीम है मुझे ये सिफ़त भी अता करे
तुझे भूलने की दुआ करूँ तो मेरी दुआ में असर न हो (बद्र)

वो आए बज़्म में इतना तो मीर ने देखा
फिर उसके बाद चराग़ों में रोशनी न रही   (मीर)

हर ज़ीहयात का है सबब जो हयात का
निकले है दम उसी के लिए क़ायनात का   (मीर)

अपने ही दिल ने न चाहा के पिएँ आबे-हयात
यूँ तो हम मीर उसी चश्मे प बेजान हुए !   (मीर)

देख तो दिल के जाँ से उठता है
ये धुआँ सा कहाँ से उठता है

ग़ोर किस दिलजले की है ये फ़लक
सुब्ह इक शोला याँ से उठता है

कौन फिर उसको बैठने दे है
जो तेरे आस्ताँ से उठता है

यूँ उठे आह उस गली से हम
जैसे कोई जहाँ से उठता है    (मीर)

कहाँ तो तय था चरागाँ हरेक घर के लिए
कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए           (दुष्यन्त)

होने लगी है जिस्म में ज़ुम्बिश तो देखिए
इस परकटे परिन्द की कोशिश तो देखिए       (दुष्यन्त)

उनकी अपील है के उन्हें हम मदद करें
चाकू की पसलियों से गुज़ारिश तो देखिए      (दुष्यन्त)

आप नज़रों से न कहिए न मैं आँखों से सुनूँ
जिस्म के हिस्से सभी अपना-अपना काम करें   (नामालूम)

तुम मुख़ातिब भी हो, क़रीब भी हो
तुमको देखें के तुमसे बात करें     (फ़िराक)

ये किसने शाख़े-गुल लाकर करीबे-आशियाँ रख दी
के मैंने शौक़े गुलबोसी में काँटों पर ज़ुबाँ रख दी  (नामालूम)

चन्द कलियाँ निशात की चुनकर,
मुद्दतों मह्वे-यास रहता हूँ
तेरा मिलना खुशी की बात सही,
तुझ से मिल कर उदास रहता हूँ   ("साहिर" लुधियानवी)

दुश्मनी जम कर करो पर इतनी गुंज़ाइश रहे
फिर कभी जब दोस्त बन जाएँ तो शर्मिन्दा न हों  (बद्र)

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िन्दग़ी की शाम हो जाए  (बद्र)

ग़ज़ल

आज आल्मारी साफ़ करते समय एक पुर्ज़े पर लिखी हुई अपनी एक पुरानी रचना (2007 की) पड़ी मिली। सोचा कि आप को ही पेश कर दूँ-

न दीन और न  ईमान रहा
दिल बुतों पे सदा क़ुर्बान रहा

वो जिसने हम पे लगाई तोहमत
सुना फिर बरसों परेशान रहा

दो घड़ी के सुकून की ख़ातिर
तमाम उम्र वो हैरान रहा

दोस्त को दोस्त समझने वाला
दोस्ती करके परेशान रहा

कहे औलादों की दानिशमन्दी
"हमारा बाप तो नादान रहा"

खुले गेसू, ये तबस्सुम, ये अदा!
सुना कल फिर कोई मेहमान रहा

घर की बुनियाद थी दीवारों पे
घर में रिश्ते नहीं सामान रहा

उन्होंने हिन्दी न समझी न पढ़ी
उनका हिन्दी पे ये एहसान रहा

ऐसे हालात में कह पाना ग़ज़ल
यक़ीनन सख़्त इम्तेहान रहा

आदाब!