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Tuesday, 20 July, 2010

सब लोग ज़माने में सितमगर नहीं होते

यह भी मेरी एक पूर्व-प्रकाशित रचना ही है। यह अन्तर्जाल पर और एक साहित्यिक पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है। मैंने इसे इसलिए रख छोड़ा था कि जब कभी कुछ नया लेखन न हो पाए - तो ब्लॉग पर  तारतम्य बनाए रखने के लिए इसे आप की नज़रे-क़रम के हवाले किया जायगा। सो आज कर रहा हूँ:
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सब लोग ज़माने में सितमगर नहीं होते
क़द एक हो तो लोग बराबर नहीं होते


होते हैं मददगार - कई बार अजनबी
जिन लोगों से उम्मीद हो-अक्सर नहीं होते

उनको तलाश लेंगे करोड़ों के बीच हम
सारे गुलों के हाथ में पत्थर नहीं होते

क़ुदरत के इल्तिफ़ात से है शायरी का फ़न
सब शे'र कहने वाले भी शायर नहीं होते

हम ही नहीं ग़ज़ल से - हमीं से ग़ज़ल भी है
हम से दिवाने सारे सुख़नवर नहीं होते

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सितमगर: अत्याचारी
फ़न : हुनर, कला, योग्यता
इल्तिफ़ात : अनुग्रह, कृपा, प्रसन्नता (बहुवचन में)
सुख़नवर: बहुत अच्छा शायर, ग़ज़लसरा, ग़ज़लगो

Friday, 16 July, 2010

क्या जाने

एक छोटी सी रुबाई:
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अदा की चोट - अदा क्या जाने
हया क्या है, भला वो क्या जाने
"अदा-वफ़ा-हया इक संग चहिए"-
ख़ुद को समझे हो क्या ख़ुदा जाने!

Thursday, 15 July, 2010

शरीफ़ लोग आजकल वाले

सारे क़िस्से फ़रेब-छल वाले
शरीफ़ लोग आजकल वाले


शहर में सारे ऐब जंगल के
और शर्मिन्दा हैं जंगलवाले


हैं तो नाराज़,मगर कहते नहीं
नाते-रिश्ते प्रपञ्च-छल वाले


ज़हर उगलें, हमें क़ुबूल नहीं
पी लिये जाम हलाहल वाले


वफ़ा-ख़ुलूस-जुनूँ-सच-ईमाँ
अपने भी तौर हैं पागलवाले


हम नहीं झोंपड़ी-महल वाले
ठिकाने ढूँढे हैं मक़्तल वाले


वही तेवर, वही तिरछी चितवन
घूरते नैन भी काजल वाले


एक 'छ्म' और दिवाना घायल-
जाने कब समझेंगे पायल वाले!


वायदे झूठे वही 'कल' वाले
सारे अन्दाज़ हैं ग़ज़ल वाले
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एक मतला, एक हुस्ने-मतला का चलन तो आम है; मगर यहाँ काफ़िए की तंगी न थी, रदीफ़ भी ख़फ़ीफ़ न थी सो कई शे'र हो गए मतले के रंग में। अब क्या करूँ?
जो मक़्ता की जगह कब्ज़ाए हुए है - उस शे'र से ग़ज़ल कहनी शुरू हुई थी।
आजकल व्यस्तता ज़्यादा है - नए कलाम नहीं हैं ये। ये सब गज़लें ड्राफ़्ट में थीं, मार्च-अप्रैल में कह ली गयी थीं, शाया अब हो रही हैं।

Thursday, 8 July, 2010

रुबाई का मौसम : दिल से दिल को आते हैं, क्या अजीब रस्ते हैं

और आज बारी है रुबाई की
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इश्क़ ने जब कभी आँखों को रुलाया होगा
सारा इल्ज़ाम इसी दिल पे तो आया होगा
सुन के गाली भी इस भरम में मुस्कराते हैं
सिवा तुम्हारे इन्हें किसने बुलाया होगा

रात से पहले जैसे शाम का नाम आता है
मौत से पहले यूँ ही राम-राम आता है
लोग छुप-छुप के आने वाले को अब क्या पूछें
बात ये है के अब वो सरेआम आता है

सब ये कहते हैं हर इन्साँ में ख़ुदा होता है
किससे पूछूँ के ये इन्सान कहाँ होता है
कल तो दुश्मन को भी महबूब समझते थे मगर
अब मुहब्बत से अदावत का गुमाँ होता है

नींद अब आजकल फ़रार है क्यूँ
ज़िंदगी इतनी ख़ुशगवार है क्यूँ
ख़ुद पे भी इस क़दर यक़ीन नहीं
जाने फिर तुझपे ऐतबार है क्यूँ

जब से वो बाग़बाँ हुए यारो
सारे जंगल धुआँ हुए यारो
शौक़े-तामीरे-शह्र ये उनका
हम तो बेआशियाँ हुए यारो

शुरू-शुरू में तड़प बेशुमार होती है
कभी तक़रार कभी ऐतबार होता है
तीसरे दौर में जब दर्द से ऊब होती है
दर-हक़ीक़त वो प्यार होता है

नज़्म कहना मेरी आदत तो नहीं
ग़ज़ल कहने की ज़रूरत तो नहीं
वो भी कतराने लगे हैं हमसे
कहीं उनको भी मुहब्बत तो नहीं

यूँ तो आँख के बादल सौ तरह बरसते हैं
बूँद-बूँद को दिल के दश्त क्यूँ तरसते हैं
सायबान वीराँ है, कारोबारे-अश्काँ है
दिल से दिल को आते हैं क्या अजीब रस्ते हैं

हरेक शाम बड़ी ख़ास शाम होती है
सुबह की उम्र इसी दम तमाम होती है
ज़िन्दगी ज़िन्दगी के इंतज़ाम में गुज़री
मौत तो और बड़ा ताम-झाम होती है

Tuesday, 6 July, 2010

वक़्त बदलते देखा

एक अजीब सी बात हो रही है। प्रशंसक होते हैं लोग रचनाओं के, रचनाकारों के या कलाकारों के (अमूमन)। एक प्रशंसक का अंदाज़ कुछ ऐसा है प्रशंसा का, मेरे इस ब्लॉग पर - कि मैं उसके प्रशंसा करने के तरीक़े का प्रशंसक बन गया हूँ।
सीखूँगा (ज़रूर सीख लूँगा) अपने इस प्रशंसक से ये अन्दाज़, मगर आज ये रचना उसी प्रशंसक को समर्पित कर रहा हूँ, स्नेह और शुभेच्छाओं सहित -

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हमने सूरज कभी उगते कभी ढलते देखा
आस्मानों का यहाँ वक़्त बदलते देखा

कमसिनी में उन्हें इक गुल पे मचलते देखा
और फिर फूल दिया जाना भी खलते देखा

जिनका हर हुक्म चला,सिक्का चला,बात चली
उन्हें पैदल भी अकेले यहीं चलते देखा

अब्र में पानी था कि आग जो अबके बरसी
धरा सुलगी, उधर आकाश उबलते देखा

ग़ुलाब गालों पे खिल-खिल के खिलाने वाले!
तुझे कलियों को दुपट्टे में मसलते देखा

Friday, 2 July, 2010

आशिकी अपनी बेपढ़ी

ज़िन्दगी धूप थी कड़ी
ख़ुशनुमा एक-दो घड़ी

की गईं मुश्किलें खड़ी-
हिम्मतें ख़ुद हुईं बड़ी

ज़िन्दगी इस क़दर सहल !
कुछ यक़ीनन है गड़बड़ी

रात रूमानी वायदा -
सुब्ह ऑफ़िस की हड़बड़ी

नज़र-ए-आशिक तुनकमिज़ाज
जब मिली - तब कहीं लड़ी

दिल का ले-ले के इम्तेहाँ-
रो दी बरसात की झड़ी

ग़म अमावस की रात से-
ख़ुशी हाथों की फुलझड़ी

मुस्कराते हों सब अगर-
नज़र देखो कहाँ गड़ी

संग लाएँ वो फ़स्ले-गुल
फेर कर जादुई छड़ी

कुछ तमन्ना भी अपनी कम,
कुछ ज़रूरत नहीं पड़ी

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और ये शे'र इश्क़े-हक़ीक़ी में अर्ज़ है:
"हरेक शै में उसका नूर,
सबमें रू-ए-ख़ुदा जड़ी"


ये एक और शे'र पैदाइशी आशिक़ों के लिए अर्ज़ है :
(दर-अस्ल यही वो शे'र है जिससे इस ग़ज़ल का आग़ाज़ हुआ था):
हुस्न उनका लुग़त जदीद
आशिक़ी अपनी बेपढ़ी
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लुग़त = शब्दकोष
जदीद = आधुनिक, नवीनतम