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Tuesday 6 July 2010

वक़्त बदलते देखा

एक अजीब सी बात हो रही है। प्रशंसक होते हैं लोग रचनाओं के, रचनाकारों के या कलाकारों के (अमूमन)। एक प्रशंसक का अंदाज़ कुछ ऐसा है प्रशंसा का, मेरे इस ब्लॉग पर - कि मैं उसके प्रशंसा करने के तरीक़े का प्रशंसक बन गया हूँ।
सीखूँगा (ज़रूर सीख लूँगा) अपने इस प्रशंसक से ये अन्दाज़, मगर आज ये रचना उसी प्रशंसक को समर्पित कर रहा हूँ, स्नेह और शुभेच्छाओं सहित -

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हमने सूरज कभी उगते कभी ढलते देखा
आस्मानों का यहाँ वक़्त बदलते देखा

कमसिनी में उन्हें इक गुल पे मचलते देखा
और फिर फूल दिया जाना भी खलते देखा

जिनका हर हुक्म चला,सिक्का चला,बात चली
उन्हें पैदल भी अकेले यहीं चलते देखा

अब्र में पानी था कि आग जो अबके बरसी
धरा सुलगी, उधर आकाश उबलते देखा

ग़ुलाब गालों पे खिल-खिल के खिलाने वाले!
तुझे कलियों को दुपट्टे में मसलते देखा

5 comments:

Virendra Singh Chauhan said...

Himanshu ji kya...baat hai.
Chha gaye aap to.

Jitni baar padha, utni baar mazaa aayaa.

All the best.waiting for your next.

नीरज गोस्वामी said...

जिनका हर हुक्म चला,सिक्का चला,बात चली
उन्हें पैदल भी अकेले यहीं चलते देखा

क्या बात है...वाह भाई वाह...
नीरज

Virendra Singh Chauhan said...

Bahut hi accha likhaa hai aapne.
padhkar dil khush ho gaya.

प्रवीण पाण्डेय said...

कदम जिनके पड़े तो, एक मज़मा सा लगा करता ,
उन्हें भी बेरुखी तनहाई में जलते देखा

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

एक से एक गजल की पीस गिराते रहते हैं आप भी !
ऐसी पीस जिसका एक एक शेर थान के जैसा हो !
वक़्त के बदलने का सुन्दर जिक्र है !