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Wednesday 27 October 2010

यहाँ हर सिम्त रिश्ते हैं जो अब मुश्किल निभाना है

बहुत आसाँ है रो देना, बहुत मुश्किल हँसाना है
कोई बिन बात हँस दे-लोग कहते हैं "दिवाना है"

हमारी ख़ुशमिज़ाजी पे तुनक-अंदाज़ वो उनका-
"तुम्हें क्यों हर किसी को हमने क्या बोला बताना है?"

मशालें ख़ूँ-ज़दा हाथों में, कमसिन पर शबाबों सी-
"चलो जल्दी चलें,फिर से किसी का घर जलाना है"

ये लाचारी कि किस्सागो हुए हम फ़ित्रतन यारो-
हमारी हर शिकायत पर वो कहते थे "फ़साना है"

किसी की दोस्ती हो तो कड़ी राहें भी कट जाएँ
यहाँ हर सिम्त रिश्ते हैं जो अब मुश्किल निभाना है

मेरी मजबूरियों को तुम ख़ुशी का नाम मत देना
यहाँ तुम भी नहीं हो अब बड़ा मुश्किल ज़माना है

वो मंज़र झील के,जंगल के,ख़ुश्बू के,चनारों के!
इन्हें भी आज ही कम्बख़्त शायद याद आना है

Friday 27 August 2010

अश'आर चन्द यूँ भी

आज के हालात का मैं तब्सरा हूँ
ख़ुश-तबस्सुम-लब मगर अन्दर डरा हूँ

बस गए जो वो किसी शर्त छोड़ते ही नहीं
टूटा-फूटा सा पुराना मकान मेरा दिल!

इस राह पे चलना भी ख़ुद हासिले-सफ़र है
मंज़िल क़रीब है पर दुश्वार रहगुज़र है


आए हैं, मुँह फुलाए बैठे हैं
लगता है ख़ार खाए बैठे हैं
उधर लाल-आँखें, चढ़ी हैं भौंहें
हम इधर दिल बिछाए बैठे हैं

Friday 20 August 2010

जागते रहिए ज़माने को जगाते रहिए

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जागते रहिए ज़माने को जगाते रहिए
ख़ैरियत-ख़ैरियत का शोर मचाते रहिए


वो जो सह लें, न कहें-उनको सहाते रहिए
वर्ना कह दें तो मियाँ ! चेहरा छुपाते रहिए


शम्मा यादों की मज़ारों पे जलाते रहिए
रोज़ इक बेबसी का जश्न मनाते रहिए


हुस्न गुस्ताख़ तमन्ना से दूर? नामुम्किन!
लाख बारूद को आतिश से बचाते रहिए


या तो खा जाइए, या रहिए निवाला बनते,
शाम के भोज का दस्तूर निभाते रहिए
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और शे'र हैं, अभी फुर्सत नहीं है टाइप करने की. बाद में लाऊँगा...

Friday 6 August 2010

उन्होंने कह दिया अच्छा सुख़न है


ज़माना पेश हम से ढंग से आए-
ज़माने को भी कोई तो बताए!


यही सोचे हैं बैठे सर झुकाए
वो देखें आज क्या तोहमत लगाए

उन्होंने कह दिया अच्छा सुख़न है
मेरे अश'आर ख़ुश-ख़ुश लौट आए


मुहब्बत की भी कोई उम्र तय है?
अगर अब है तो फिर आए-न-आए!


झरे दिन जैसे मुट्ठी रेत की, या
उमर-मछली फिसल दरिया में जाए
………उमर-मछ्ली फिसल दरिया में जाए!

Tuesday 20 July 2010

सब लोग ज़माने में सितमगर नहीं होते

यह भी मेरी एक पूर्व-प्रकाशित रचना ही है। यह अन्तर्जाल पर और एक साहित्यिक पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है। मैंने इसे इसलिए रख छोड़ा था कि जब कभी कुछ नया लेखन न हो पाए - तो ब्लॉग पर  तारतम्य बनाए रखने के लिए इसे आप की नज़रे-क़रम के हवाले किया जायगा। सो आज कर रहा हूँ:
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सब लोग ज़माने में सितमगर नहीं होते
क़द एक हो तो लोग बराबर नहीं होते


होते हैं मददगार - कई बार अजनबी
जिन लोगों से उम्मीद हो-अक्सर नहीं होते

उनको तलाश लेंगे करोड़ों के बीच हम
सारे गुलों के हाथ में पत्थर नहीं होते

क़ुदरत के इल्तिफ़ात से है शायरी का फ़न
सब शे'र कहने वाले भी शायर नहीं होते

हम ही नहीं ग़ज़ल से - हमीं से ग़ज़ल भी है
हम से दिवाने सारे सुख़नवर नहीं होते

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सितमगर: अत्याचारी
फ़न : हुनर, कला, योग्यता
इल्तिफ़ात : अनुग्रह, कृपा, प्रसन्नता (बहुवचन में)
सुख़नवर: बहुत अच्छा शायर, ग़ज़लसरा, ग़ज़लगो

Friday 16 July 2010

क्या जाने

एक छोटी सी रुबाई:
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अदा की चोट - अदा क्या जाने
हया क्या है, भला वो क्या जाने
"अदा-वफ़ा-हया इक संग चहिए"-
ख़ुद को समझे हो क्या ख़ुदा जाने!

Thursday 15 July 2010

शरीफ़ लोग आजकल वाले

सारे क़िस्से फ़रेब-छल वाले
शरीफ़ लोग आजकल वाले


शहर में सारे ऐब जंगल के
और शर्मिन्दा हैं जंगलवाले


हैं तो नाराज़,मगर कहते नहीं
नाते-रिश्ते प्रपञ्च-छल वाले


ज़हर उगलें, हमें क़ुबूल नहीं
पी लिये जाम हलाहल वाले


वफ़ा-ख़ुलूस-जुनूँ-सच-ईमाँ
अपने भी तौर हैं पागलवाले


हम नहीं झोंपड़ी-महल वाले
ठिकाने ढूँढे हैं मक़्तल वाले


वही तेवर, वही तिरछी चितवन
घूरते नैन भी काजल वाले


एक 'छ्म' और दिवाना घायल-
जाने कब समझेंगे पायल वाले!


वायदे झूठे वही 'कल' वाले
सारे अन्दाज़ हैं ग़ज़ल वाले
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एक मतला, एक हुस्ने-मतला का चलन तो आम है; मगर यहाँ काफ़िए की तंगी न थी, रदीफ़ भी ख़फ़ीफ़ न थी सो कई शे'र हो गए मतले के रंग में। अब क्या करूँ?
जो मक़्ता की जगह कब्ज़ाए हुए है - उस शे'र से ग़ज़ल कहनी शुरू हुई थी।
आजकल व्यस्तता ज़्यादा है - नए कलाम नहीं हैं ये। ये सब गज़लें ड्राफ़्ट में थीं, मार्च-अप्रैल में कह ली गयी थीं, शाया अब हो रही हैं।

Thursday 8 July 2010

रुबाई का मौसम : दिल से दिल को आते हैं, क्या अजीब रस्ते हैं

और आज बारी है रुबाई की
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इश्क़ ने जब कभी आँखों को रुलाया होगा
सारा इल्ज़ाम इसी दिल पे तो आया होगा
सुन के गाली भी इस भरम में मुस्कराते हैं
सिवा तुम्हारे इन्हें किसने बुलाया होगा

रात से पहले जैसे शाम का नाम आता है
मौत से पहले यूँ ही राम-राम आता है
लोग छुप-छुप के आने वाले को अब क्या पूछें
बात ये है के अब वो सरेआम आता है

सब ये कहते हैं हर इन्साँ में ख़ुदा होता है
किससे पूछूँ के ये इन्सान कहाँ होता है
कल तो दुश्मन को भी महबूब समझते थे मगर
अब मुहब्बत से अदावत का गुमाँ होता है

नींद अब आजकल फ़रार है क्यूँ
ज़िंदगी इतनी ख़ुशगवार है क्यूँ
ख़ुद पे भी इस क़दर यक़ीन नहीं
जाने फिर तुझपे ऐतबार है क्यूँ

जब से वो बाग़बाँ हुए यारो
सारे जंगल धुआँ हुए यारो
शौक़े-तामीरे-शह्र ये उनका
हम तो बेआशियाँ हुए यारो

शुरू-शुरू में तड़प बेशुमार होती है
कभी तक़रार कभी ऐतबार होता है
तीसरे दौर में जब दर्द से ऊब होती है
दर-हक़ीक़त वो प्यार होता है

नज़्म कहना मेरी आदत तो नहीं
ग़ज़ल कहने की ज़रूरत तो नहीं
वो भी कतराने लगे हैं हमसे
कहीं उनको भी मुहब्बत तो नहीं

यूँ तो आँख के बादल सौ तरह बरसते हैं
बूँद-बूँद को दिल के दश्त क्यूँ तरसते हैं
सायबान वीराँ है, कारोबारे-अश्काँ है
दिल से दिल को आते हैं क्या अजीब रस्ते हैं

हरेक शाम बड़ी ख़ास शाम होती है
सुबह की उम्र इसी दम तमाम होती है
ज़िन्दगी ज़िन्दगी के इंतज़ाम में गुज़री
मौत तो और बड़ा ताम-झाम होती है

Tuesday 6 July 2010

वक़्त बदलते देखा

एक अजीब सी बात हो रही है। प्रशंसक होते हैं लोग रचनाओं के, रचनाकारों के या कलाकारों के (अमूमन)। एक प्रशंसक का अंदाज़ कुछ ऐसा है प्रशंसा का, मेरे इस ब्लॉग पर - कि मैं उसके प्रशंसा करने के तरीक़े का प्रशंसक बन गया हूँ।
सीखूँगा (ज़रूर सीख लूँगा) अपने इस प्रशंसक से ये अन्दाज़, मगर आज ये रचना उसी प्रशंसक को समर्पित कर रहा हूँ, स्नेह और शुभेच्छाओं सहित -

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हमने सूरज कभी उगते कभी ढलते देखा
आस्मानों का यहाँ वक़्त बदलते देखा

कमसिनी में उन्हें इक गुल पे मचलते देखा
और फिर फूल दिया जाना भी खलते देखा

जिनका हर हुक्म चला,सिक्का चला,बात चली
उन्हें पैदल भी अकेले यहीं चलते देखा

अब्र में पानी था कि आग जो अबके बरसी
धरा सुलगी, उधर आकाश उबलते देखा

ग़ुलाब गालों पे खिल-खिल के खिलाने वाले!
तुझे कलियों को दुपट्टे में मसलते देखा

Friday 2 July 2010

आशिकी अपनी बेपढ़ी

ज़िन्दगी धूप थी कड़ी
ख़ुशनुमा एक-दो घड़ी

की गईं मुश्किलें खड़ी-
हिम्मतें ख़ुद हुईं बड़ी

ज़िन्दगी इस क़दर सहल !
कुछ यक़ीनन है गड़बड़ी

रात रूमानी वायदा -
सुब्ह ऑफ़िस की हड़बड़ी

नज़र-ए-आशिक तुनकमिज़ाज
जब मिली - तब कहीं लड़ी

दिल का ले-ले के इम्तेहाँ-
रो दी बरसात की झड़ी

ग़म अमावस की रात से-
ख़ुशी हाथों की फुलझड़ी

मुस्कराते हों सब अगर-
नज़र देखो कहाँ गड़ी

संग लाएँ वो फ़स्ले-गुल
फेर कर जादुई छड़ी

कुछ तमन्ना भी अपनी कम,
कुछ ज़रूरत नहीं पड़ी

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और ये शे'र इश्क़े-हक़ीक़ी में अर्ज़ है:
"हरेक शै में उसका नूर,
सबमें रू-ए-ख़ुदा जड़ी"


ये एक और शे'र पैदाइशी आशिक़ों के लिए अर्ज़ है :
(दर-अस्ल यही वो शे'र है जिससे इस ग़ज़ल का आग़ाज़ हुआ था):
हुस्न उनका लुग़त जदीद
आशिक़ी अपनी बेपढ़ी
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लुग़त = शब्दकोष
जदीद = आधुनिक, नवीनतम

Monday 28 June 2010

बदलते मौसमों की ज़ात की बात

बदलते मौसमों की ज़ात की बात
धूप में ख़ुशनुमा बरसात की बात


दिन भी सूरज सा दहकता अंगार
रात भी सुलगे से हालात की बात


अपनी ख़ातिर थी वही काम की बात
टाल दी आपने जज़्बात की बात


इश्क़ है सब्र - हुस्न बेचैनी
कशिश दोनों की-करामात की बात


"कोई आ जायगा…" - "तो क्या!" पे ख़तम-
हर अधूरी सी मुलाक़ात की बात


चाँद बातूनी है मुँह खोल न दे -
बात चल निकले न फिर बात-की-बात


कड़े पहरों से गुमशुदा होकर -
मिली अख़बार में फिर रात की बात

Friday 25 June 2010

मैं भी हूँ (ग़ज़ल)

यह नेट पर पूर्वप्रकाशित रचना है - अनुभूति पर - पूर्णिमा वर्मन जी के सौजन्य से। आज आप लोगों की सेवा में प्रस्तुत है, सादर:
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बाक़ी-बाक़ी सी प्यास मैं भी हूँ
गो उफ़नता गिलास मैं भी हूँ

वो अकेला दरख़्त यादों में गुम
उसी के आस-पास मैं भी हूँ

हमक़दम वक़्त के बदलता रहा
अब ज़रा बदहवास मैं भी हूं

मेरे होठों पे तबस्सुम ही सही,
दोस्त मेरे! उदास मैं भी हूँ

आइनों में भी आपका चेहरा!
आपके हमशनास मैं भी हूँ।

ज़ुह्द हो या उसूफ़े-शौक़ का दौर
मह्वे-तश्बीशो-यास मैं भी हूँ

उसकी यादों का बक्स ज़ंगशुदा
इक पुराना लिबास मैं भी हूँ
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तबस्सुम: मुस्कान
मह्वे-तश्बीशो-यास : निराशा और चिन्ता के बीच,
मह्व : बीच में
तश्बीश: फ़िक्र, तरद्दुद, परेशानी
यास: निराशा
हमशनास : उसी सूरत/पहचान वाला, हमशक्ल, हू-ब-हू
ज़ुह्द: संयम, आत्मनिग्रह, अपने पे क़ाबू रखना
उसूफ़े-शौक़: लिप्सा का उफ़ान, भोग-विलास की तीव्रता

Monday 21 June 2010

लोगों को नींद देर रात तक नहीं आती

शे'र ख़ुद मिट गया ग़ज़ल होकर
प्रश्न शर्मिंदा रहा - हल होकर

बात ये है कि कभी कहा था -
"जबसे मेरा अफ़साना शहर में हुआ है आम
लोगों को नींद देर रात तक नहीं आती
"

कल ख़्याल आया कि क्यों न इसे ग़ज़ल की शक्ल दी जाए! सो कुछ बना तो - मगर वो शे'र न रहा। अब पसोपेश के तसव्वुर में हूँ - इसे किस शक्ल में जीने दिया जाए - शे'र को जो 'मदरप्लाण्ट' है, या नए अश'आर को जो नवांकुर हैं?
फ़िलहाल तो सोच में ही हूँ।
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होठों पे दिल-ज़ेहन की बात तक नहीं आती
उनकी कोई भी चाल-मात तक नहीं आती

अपनी कोई साज़िश भी घात तक नहीं आती
जाँ-बख़्शी* भी उनकी हयात* तक नहीं आती

हैं काम भलाई के या ऐयारी का आलम
दाएँ की ख़बर बाएँ हाथ तक नहीं आती#

जबसे मेरा अफ़साना शहर में हुआ है आम
ख़ुश-नाचते-गाते बरात तक नहीं आती

सूरज भी लगे जैसे न सोया हो रात भर
ख़ुद रात भी - अब देर रात तक नहीं आती

जिनके बिना इक दिन कभी जीना मुहाल था
ता'ज्जुब है कि अब उनकी याद तक नहीं आती

तन्हाइयाँ हैं, बस! न ख़ुशी है - न कोई ग़म
बेकैफ़* उम्र क्यूँ वफ़ात* तक नहीं आती
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जाँ-बख़्शी = जीवन-दान
हयात = जीवन, ज़िन्दगी
बे-कैफ़ = आनन्द-रहित, बेमज़ा, जब सारे नशे उतर चुके हों
वफ़ात = मृत्यु, मोक्ष, मुक्ति
#ईसा का संदेश :  "भलाई का काम इस तरह करो कि दाएँ हाथ को बाएँ हाथ की ख़बर न हो""

Saturday 19 June 2010

बातों बातों में चली आप की बात : लोग सब समझे क़ायनात की बात

कभी चुप हैं, तो कभी आप की बात
और फिर आपकी - बस आपकी बात
 
फूल-तितली-बहार-झरनों के मिस
बातों-बातों में चली आपकी बात

लोग सब समझे क़ायनात की बात
हम तो करते रहे बस आपकी बात

जाने क्या-क्या कहा, किस-किस से कहा
आप से कैसे कहें आप की बात

कहें दीवाना, जो हँसते हैं - हँसें
लोग क्या जानें - क्या है आपकी बात

Thursday 17 June 2010

दहन (ग़ज़ल) : चित्र बोलोजीडॉट्नेट से साभार

एक पूर्वप्रकाशित रचना है 'दहन'। यह नेट पर मेरी प्रथम हिन्दी कविता थी - जो बोलोजीडॉट्नेट पर 2000 में प्रकाशित हुई। फिर दोबारा नहीं लिखा उस जालस्थल पर, क्योंकि उन्होंने मेरी कविता को संपादित कर दिया - प्रकाशन के पूर्व और उससे कविता मर गयी। यह मेरी स्वीकृति के बिना था और मेरी समझ में कविता या ग़ज़ल में सुधार करने का अधिकार मूल रचनाकार के अतिरिक्त किसी को नहीं होता।
यहीं पूर्णिमा वर्मन जी से परिचय हुआ और उस समय कुछ हिन्दी के लिए करने का जोश कुछ दिन चला। फिर समय ने करवट बदली तो हमने एक लम्बी चुप्पी साध ली। अब हम नौसिखिए हो गए,मज़ा आ रहा है।
दहन

मासूम मुहब्बत से कई लोग जल गए
हम जल के यूँ मिले के सभी हाथ मल गए


दिल में रहा न जोश तो दिल-दिल नहीं रहे
वो दिल ही क्या जो अक़्ल के हाथों सँभल गए


तक़्दीर की बुलन्दी भी लोगों को खल गयी
निकला ज़रूर दम, मगर अरमाँ निकल गए


उनको गिला - के वैसे भी हम जी तो न पाते
ये तो उन्हें जलाने को हम साथ जल गए


माचिस की तीलियों की तरह उम्र क्या ढली
सब जात-पाँत ख़ाक़ की सूरत में ढल गए



जो बन सके मशाल - मेरे साथ चल पड़े
जो डर गए, वो रुक-के - समझे हमको छल गए


जब तक जिए मुरझाए से घुट-घुट के साँस-साँस
जल कर लगा के हम खिले और बन कँवल गए


आशिक़ ये समझे जलने से दुनिया बदल गई
दुनिया ये समझी जीने के मानी बदल गए


दुनिया की इस सराय में सारे हैं मुसाफ़िर
कल आए थे-कुछ आज, तो कुछ लोग कल गए
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और आख़िर में एक शे'र तस्वीर की तारीफ़ में भी -

"तस्वीर ख़ुद ग़ज़ल है के नज़रों का इक फ़रेब
इतना हसीं के जलने को लाखों मचल गए!"

Friday 11 June 2010

लगा माँ की मुझे दुआ सा कुछ

शायरी - ग़ज़लें, नज़्में क्या-क्या कुछ
लगा माँ की मुझे दुआ सा कुछ

जाने जुगनू कि हौसले के चराग़
यादों-यादों जला बुझा सा कुछ

फिर से कुछ सोच लिया शाम ढले
हुआ फिर दिल से लापता सा कुछ

बेरूख़ी भी है, और ख़फ़ा भी नहीं-
ज़ुल्म है, पर लगे अदा सा कुछ

बूढ़े पत्तों की बेबसी कि उन्हें
कहे पतझड़ भी बेवफ़ा सा कुछ

अब के सावन में घटा के अंदाज़
साथ रहते हुए जुदा सा कुछ

कुछ कहा हमने - लोग कुछ समझे
और हर शख़्स फिर ख़फ़ा सा कुछ

जुड़ते जाते हैं लाखों मंसूबे
दिल ही दिल में है टूटता सा कुछ

मुझसे पूछी है मेरी राय तो अब
देख ले तू भी आइना सा कुछ
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अलहदा -

और अश'आर मैं कह सकता था
पर है अब मुझमें अनमना सा कुछ

इश्क़ का फाड़ के ख़त गुस्से में
हुस्न अब फिर है मेहरबाँ सा कुछ

तेरी रहमत पे शक़ नहीं, लेकिन
अपनी बर्बादी - क़ायदा सा कुछ

हमको सारे तेरे इल्ज़ाम क़ुबूल
और फिर भी तुझे गिला सा कुछ!

"एक बीमार भी बाक़ी न बचे"
बँटा फिर ज़हर या दवा सा कुछ

हम ये समझे - कि कुछ नहीं समझे
ज़माना समझा जाने क्या-क्या कुछ

Wednesday 9 June 2010

कितना वो पानी में है

ख़ुल्द में कब वो मज़ा जो दुनिया-ए-फ़ानी में है
होश क्या जाने कि क्या-क्या है जो नादानी में है


हौसलों का, हिम्मतों का इम्तेहाँ है ज़िन्दगी
जो मज़ा मुश्क़िल में है, वो ख़ाक़ आसानी में है


जो सदा मँझधार से, लौटा भँवर को जीतकर;
साहिलों पर बहस अब तक, कितना वो पानी में है


जीना बिन-ख़्वाहिश के - या लेकर अधूरी हसरतें
इत्तिक़ा दर-अस्ल ख़ुद ख़्वाहिश की तुग़यानी में है


ख़ुदपरस्ती में जिया, ख़ुद के लिए मरता रहा
ख़्वाहिशे-जन्नत में वो भी सफ़हे-क़ुर्बानी में है
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ख़ुल्द = स्वर्ग, जन्नत
फ़ानी = नश्वर, नाशवान
साहिल = किनारा, तट
इत्तिक़ा = संयम, इन्द्रिय निग्रह
तुग़यानी = बाढ़, उफ़ान
ख़्वाहिशे-जन्नत = स्वर्ग की इच्छा
सफ़हे-क़ुर्बानी = क़ुर्बानी / बलिदान देने के लिए लगी हुई क़तार

Saturday 5 June 2010

लोग पत्थर उठाए फिरते हैं!

लोग पत्थर उठाए फिरते हैं
और हम सर उठाए फिरते हैं

दुश्मनों से गिला भला कैसा
दोस्त ख़ंजर उठाए फिरते हैं

जब कहे बादबाँ* - "चलो", चल दें!
हम भी लंगर उठाए फिरते हैं

ग़ैर पे उँगली उठे या न उठे-
हम पे अक्सर उठाए फिरते हैं

आस्माँ तू उठा उन्हें जो तुझे-
रोज़ सर पर उठाए फिरते हैं
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बादबाँ = पाल के सहारे चलने वाली नौका का नाविक-निर्देशक (कैप्टेन : आज के जलयान-पोत-नौका का)
यहाँ भावार्थ ऊपर से बुलावा आने और उसके लिए आसक्ति का लंगर उठाकर तैयार बैठे होने का है।

Friday 4 June 2010

दिल ये नादाँ फिर दिवाना हो गया !

उस गली में आना-जाना हो गया
दिल का यारो आबो-दाना हो गया


आपसे सुनने-सुनाने की सुनी-
किस क़दर दुश्मन ज़माना हो गया


कोई तहज़ीबन भी मुस्काया अगर
दिल ये नादाँ-फिर दिवाना हो गया


ये इबादत - उसके नक़्शे-पा* दिखे
फ़र्ज़ अपना सर झुकाना हो गया


सिर्फ़ दो दिन आपसे मिलते हुए
जाने कब रिश्ता पुराना हो गया
----------------------------------------
इबादत = उपासना, पूजा
नक़्शे-पा = पद-चिह्न
तहज़ीबन = औपचारिकता-वश, शिष्टाचार-वश

Sunday 30 May 2010

साक़िया और पिला, और पिला

साक़िया और पिला, और पिला
सितम कम गुज़रे अभी और जिला

कोई शिक्वा, न शिकायत, न गिला
ऐसे देते हैं मुहब्बत का सिला !

इरादतन कुरेदता हो जो ज़ख़्म,
ऐसा दुनिया में पराया न मिला

हमने उसको बना लिया माली
जिसकी मर्ज़ी बिना पत्ता न हिला

वही रिमझिम है - वही इन्द्रधनुष
या ख़ुदा याद फिर उनकी न दिला

Tuesday 25 May 2010

ज़माना हुआ

हमको रूठे-मने ज़माना हुआ
उनसे बिछड़े-मिले ज़माना हुआ


गर्द आईनों पे, शर्मिन्दा हम
सर झुके ही झुके ज़माना हुआ


अच्छे-अच्छों की नीयतें देखीं
अपनी बिगड़े हुए ज़माना हुआ


क़िस्से जारी हैं-रात बाक़ी है
ज़िक्र उसका* किए ज़माना हुआ


हमको अत्फ़ाल* दे रहे हैं सलाह
चुपके सुनते हमें ज़माना हुआ


दिल लगा ऐसा फ़ानी* दुनिया से
दिल को अपना कहे ज़माना हुआ


अब न यादें हैं न हमदर्द कोई
ख़्वाब देखे हमें ज़माना हुआ


हिम्मतें एक तरफ़, दूसरी तरफ़ दुनिया
बीच में हम खड़े - ज़माना हुआ


हम समझदार, ख़ून ठण्डा है
जंग हक़ की लड़े ज़माना हुआ

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संदर्भ:
1) 'उस' से इशारा 'उस' की तरफ़ है
2) अत्फ़ाल=बच्चे,नासमझ,छोटे
3) वाबस्ता=सम्बन्धित
4) फ़ानी=नश्वर, नाशवान

Tuesday 18 May 2010

बरसों बाद

शे'र कहते बना है बरसों बाद
दर्द से सामना है बरसों बाद

आमना-सामना है बरसों बाद
मामला फिर ठना है बरसों बाद


आज फिर ख़ंजरों का जलसा है
एक सीना तना है बरसों बाद

 
भेड़िए सहमे हैं, कोई वारिस
शेरनी ने जना है बरसों बाद

दोनों मिलना तो चाहते हैं मगर
बीच में फिर अना है बरसों बाद

ज़ुल्म सहने से कब गुरेज़ हमें
हँसते रहना मना है बरसों बाद

सुना उस संगदिल का दामन भी
आँसुओं से सना है बरसों बाद

ख़ुद को ख़ुद से मिलाने की ख़ातिर
फिर कोई पुल बना है बरसों बाद

दिल की पगडण्डी पे निकले हैं ख़याल
याद का वन घना है बरसों बाद

Sunday 16 May 2010

एक रुबाई

चार दिन की ज़िन्दगी में उम्र भर के वायदे

पीढ़ियों की दुश्मनी के ख़ानदानी क़ायदे

दिल की दौलत बाँट कर तू जीत ले सारा जहाँ

वर्ना गिनता रह टके औ कौड़ियों के फ़ायदे

Friday 14 May 2010

सारे सुख़न हमारे झूठ

सारे सुख़न* हमारे झूठ
गाँव सहन* चौबारे झूठ


चना-चबेना हो तो दो-
किश्मिश और छुआरे झूठ


दुनिया सपने जैसा सच
आँख खुली तो सारे झूठ


उनके होठों पर लगते
कितने प्यारे-प्यारे झूठ


परदेसी के वादों पर
कब तक रहें कुँआरे झूठ


अपना कमरा एसी है
सूखा-बाढ़ तुम्हारे झूठ


जन-गण-मन असमञ्जस में
सत्ता के गलियारे झूठ


थाली की रोटी आगे
चन्दा और सितारे झूठ


झूठ सरासर क़ायम है
सच के सारे नारे झूठ


माज़ी* से मुस्तकबिल* तक
सुख के रहे दुलारे झूठ


मँझधारों सच तोड़े दम
तकते रहें किनारे झूठ
**************************
सुख़न = कथन, उक्ति, वादा, बातचीत, कविता, कहावत। (जो कुछ शायर कहे)
सहन = आँगन
माज़ी = अतीत, बीता हुआ
मुस्तक़बिल = भविष्य, आगामी

Thursday 13 May 2010

जाँ-ब-लब, तुझ नज़र : एक छोटी बह्र की तुक और ग़ज़ल

छोटी बह्र मेरी ज़ाती पसंद है। मुश्किल जो होती है, ऐसा सुना है। पहले भी मैंने छोटी बह्र में कई बार कही हैं ग़ज़लें, मगर अपने आप से एक वादा था कि पहले का कहा हुआ यहाँ नहीं लाऊँगा, और फिर इतनी छोटी बह्र में इसके पहले कहा भी सिर्फ़ एक बार है। अब ये रचना जनाब वीनस 'केशरी' से किया हुआ वादा भी है, और एक तजुर्बा भी, इसी में तुकबन्दी भी है और ग़ज़ल भी-
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हम इधर
दम उधर


बेवजह
ग़म-न-कर


यूँ न फिर
दर-ब-दर


हौसला
रख मगर


अर्श ला
फ़र्श पर


बस ज़रा
रख सबर


चुन नई
रहगुज़र


अब सुकूँ
अब सफ़र


रोज़ जी
रोज़ मर


जाँ-ब-लब
तुझ नज़र


फ़ितनागर
बे-ज़रर


बेख़बर
अब-न-डर


देख ले
भर नज़र


दर्द को
प्यार कर


क्या अगर
क्या मगर


रञ्जिशें
तर्क कर


ला दुआ-
में असर


है न "वो"
जल्वागर


बन्दे-ग़म
बख़्तवर


दश्ते-दिल
बे-शजर


तिश्नालब
हर लहर


चश्मो-रुख़
तर-ब-तर


तेग़ो-तंज़
बे-असर


इर्स-ए-इश्क़
जाम:दर


अश्क़ो-वक़्त
बख़्यागर

----------------------------------------------
अर्श = आकाश, आस्माँ, ऊपरवाला
जाँ-ब-लब = जब जान होठों तक चली आए, जान निकलने ही वाली हो
तुझ नज़र = (प्राचीन उर्दू प्रयोग) तेरी निगाह पड़ने से, (या) तुझको समर्पित
फ़ितनागर = साज़िशी, लोगों को भड़का कर उपद्रव / दंगा कराने वाला, षड्यंत्रकारी
(यहाँ 'त' आधा होना चाहिए मगर टाइप करने में जुड़ कर फ़ित्नागर हो जाता है)

बे-ज़रर = जिससे कोई हानि न पहुँचे, बेहद सीधा-सादा
रञ्जिश = वैमनस्य, नाराज़गी, ख़फ़गी, दुश्मनी
तर्क = परित्याग, छोड़ना
जल्व:गर = प्रकट, रूनुमा
बन्दे-ग़म = प्रेम का फ़ंदा, दु:ख का फ़ंदा (यहाँ अर्थ है - प्रेम के फंदे में [फँसा हुआ है जो]
बख़्तवर = सौभाग्यशाली, ख़ुशनसीब, बख़्तयार
दश्ते-दिल = हृदय का वन (जंगल)
शजर = पेड़, वृक्ष
तिश्नालब = प्यासे होंठ वाला/वाली
चश्मो-रुख़ = आँखें और गाल
तेग़ो-तंज़ = तलवार और ताने
अश्क़ो-वक़्त = आँसू और समय
इर्स-ए-इश्क़ ; इर्स = परम्परा, पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाली परम्परा, इर्से-इश्क़ = प्रेम की परम्परा
जाम:दर = कपड़े फाड़ने वाला; शोकातिरेक से या पागलपन, जुनून से
बख़्य:गर = तुरपाई करने वाला, सिलनेवाला, यहाँ (दिल के) घाव/ज़ख़्म भरने के अर्थ में प्रयुक्त

Tuesday 11 May 2010

मेरी ख़ुश्बू (अब ग़ज़ल)


ज़िक्र होगा तेरा ख़ामोश मैं हो जाऊँगा
इसी ख़ामोशी को मैं उम्र भर निभाऊँगा

टूट सकता था तेरी झूठी क़सम सा मैं भी
ये क़सम ली है कि अब मैं न क़सम खाऊँगा

ख़ाब-दर-ख़ाब तेरी सहमी सी हर चाहत को
अक्स-बर-अक्स* मैं तामीर* कर दिखाऊँगा

क़तरा-क़तरा मैं तेरी प्यास पे बादल सा घिरूँ
होठों की सीप में गौहर* सी शफ़क* पाऊँगा

याद बनकर मैं चला आऊँगा तन्हाई में
लौटते वक़्त मैं पलकों से ढुलक जाऊँगा

मैं जो बिछड़ा तो बिछ्ड़ जाऊँगा गुज़रे पल सा
वक़्त जैसा तेरे हाथों से निकल जाऊँगा

वक़्त से आगे बहुत आगे निकलना है मुझे
ख़ुद से मिलने को अभी वक़्त न दे पाऊँगा

गले लग कर किसी मासूम गुज़ारिश* जैसा
बेबसी बन के मैं ख़ामोश रह न पाऊँगा

तू ख़ुशी की तरह दो पल में मुझे छोड़ भी दे
साथ सदमे सा तेरा उम्र भर निभाऊँगा

मैं आफ़ताब* का वारिस हूँ रात भर के लिए
ख़ला होते ही, मैं जुगनू सा चमक जाऊँगा

कोने-कोने से ये तारीक़ी* मिटा कर शब* भर
सुब्ह होगी तेरी, मैं चाँद सा ढल जाऊँगा

ज़र्रा-ज़र्रा* मेरी ख़ुश्बू से रहेगा आबाद
मैं लख़्त-लख़्त* हवाओं में बिखर जाऊँगा


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अमरेन्द्र जी! आप अब तो संतुष्ट हैं?
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अक्स-बर-अक्स = हर छवि या प्रतिबिम्ब
गौहर = मोती
शफ़क = उषा की चमक (यहाँ मोती की चमक)
ज़र्रा-ज़र्रा = कण-कण
लख़्त-लख़्त = टुकड़ा-टुकड़ा
तारीक़ी = अंधकार
शब = रात
तामीर = साकार, निर्मित
आफ़ताब = सूर्य
गुज़ारिश = प्रार्थना, इच्छा
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Monday 10 May 2010

मुफ़्लिस के अंदाज़े-बयाँ में, अपना वज्हे-तरब देखा है

ये पोस्ट संगम-तीरे पर हो चुकी थी। उसके बाद मैंने दोबारा इस ब्लॉग को शुरू करने का मन बनाया, क्योंकि दोस्त यहाँ लगातार आ रहे थे, और तभी मुफ़्लिस साहब ने पूछ भी लिया कि कब ये ग़ज़ल पोस्ट होगी। ज़ाहिर है कि उन्होंने संगम-तीरे नहीं देखा था। सो उनकी बात पर मैं इसे यहाँ भी ले आया हूँ। मगर इसका असली मज़ा तभी आएगा जब इसे मुफ़्लिस साहब की उस ग़ज़ल के साथ पढ़ा जाए जिससे प्रेरित होकर यह कही गई-
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जब कोई ग़ज़ल अच्छी लगती है तो उसी बह्र में वहीं कुछ कहने की कोशिश करता हूँ के ये टिप्पणी भी हो जाए और तोहफ़ा भी नज़राने और शुकराने के तौर पर। कभी-कभी ग़ज़ल को ला के पोस्ट भी बना देता हूँ। कितनी पुर्जियाँ तो यूँ ही  पा'माल हो गईं। आप सब का शुक्रिया कि आप की बदौलत कम्प्यूटर पर लिखने से बाद में अगर चाहूँ तो कुछ बचा खुचा मिल तो जाएगा। तो मुफ़्लिस साहब की ताज़ा ग़ज़ल पर टिप्पणी -


हमने आकर अब देखा है
बह्रो-वज़्न ग़ज़ब देखा है


ग़ज़ल कुआँरे हाथों मेंहदी
रचने सा करतब देखा है


ढाई आखर पढ़ते हमने
क़ैस* सर-ए-मकतब* देखा है


शौक़ बहुत लोगों के देखे
हुनर मगर ग़ायब देखा है


टूटी खाट, पुरानी चप्पल
शायर का मन्सब* देखा है


मुफ़्लिस के अंदाज़े बयाँ में
अपना वज्हे-तरब* देखा है


जब-तब हमने सब देखा है
मत पूछो क्या अब देखा है


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सर-ए-मकतब=पाठशाला में, क़ैस=मजनूँ;
वज्हे-तरब=प्रसन्नता/आनन्द का कारण, मन्सब=जागीर, एस्टेट
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मुफ़्लिस साहब की ग़ज़लगोई पसन्द आई, सो ये टिप्पणी दे रहा हूँ। इसे ले जाकर अपनी पोस्ट भी सोचता हूँ बना दूँ के लोग देख सकें…
बहुत अच्छे, जनाब मुफ़्लिस साहब! जारी रहिए…

Saturday 8 May 2010

चन्द अशआर जो तन्हा रहे जवानी भर (ग़ज़ल)

सुकूँ से बैठ के सुनना - सुनाना होना था
तुम्हें भी आज ही क्योंकर रवाना होना था

चन्द अशआर जो तन्हा रहे जवानी भर-
इक न इक रोज़ तो इनको दिवाना होना था

आके इस उम्र में बदनाम हुए जब तुमको
गँवा के होशो-ख़िरद भी सयाना होना था

ख़ैर मशहूर तो दिल का फ़साना होना था
मगर कुछ दिन तो अभी आना-जाना होना था

जहाँ बरसाने की राधा को टेरे है बंसी-
गली मोहन की - हमारा ठिकाना होना था

Monday 3 May 2010

चन्द अशआर जो तन्हा रहे

ये मेरे वो शे'र और रुबाई हैं जिन्हें कभी कहीं पुर्ज़ों पे लिख के भूला, जब मिले तो टुकड़ों को इकट्ठा करते-करते जो कुछ बचा वो आप को नज़राने के तौर पर सौंपता हूँ। ये मेरे दीवान में भी इसी शक्ल में शामिल होंगे, सिवाय उन अशआर के जिन्हें थोड़ा फेर-बदल के साथ ग़ज़ल की शक्ल दी जा सकी है।
इन में कई जगह आईन की पाबन्दी नहीं भी रह पाई है, क्योंकि मिज़ाज अलग है, कहन अलग है, सारा माहौल जदीद है।


नींद के गाँव में सुनते हैं ख़्वाब उगते हैं,
हक़ीक़त पेट की निपटा लें तो सोया जाए


भूल से जान कह दिया तुमको,
साथ तुम भी हमारा छोड़ चले!


सोचते हैं सुबह-सुबह अक्सर-
शाम आएगी तो तुम आओगे!


तुम वफ़ा ख़ुद हो मुज़स्सिम, सिर से पाँव तलक मैं प्यार-
क्यूँ  न   शोले   हों   हवा  में,  क्यूँ   न   रुत   हो   बेक़रार!


हम वफ़ा से इस तरह कुछ बेवफ़ाई कर गए-
ज़िंदगी बीमार जब होने लगी हम मर गए


हर घड़ी अब तेरी याद आती है
ज़िन्दगी  नज़्म  हुई  जाती  है


दोस्तों से वो छुपाने लगे हैं हाल-ए-दिल
उन्हें यक़ीं है कि हम ख़ैरख़्वाह हैं उनके


मैं जिस जहाँ को बदलने की बात करता था
उसने आख़िर हौले-हौले मुझे बदल डाला


फ़कत उम्मीद है - ख़ुश आप होंगे, और मैं ख़ुश हूँ
ये वो तिन्का है जिसको ले के दरिया पार कर लूँगा


शाहराहों पे मौत आई जब भी रथ पे सवार
ज़िंदगी ख़ुद-ब-ख़ुद फ़ुटपाथ पर चली आई


लोग क्या जानें वो रफ़्तार जहाँ तक पहुँचे
जहाँ पे थे, वहीं पे हैं, किसी पहिए की तरह


हमने देखा उधर तो उनको देखते पाया
ऐसे शर्माए वो हमको भी शर्म आ ही गई


टकटकी बाँध के ढूँढा किए कमर उनकी-
और आख़िर हमारी नज़र भी बल खा ही गई


"आओ-बैठो" "शुक्रिया", "अच्छा चलूँ" "फिर आना कल!"
ना तो आगे बढ़ सके, इससे न हम पीछे हटे



हसीं हर-इक तो नहीं बेवफ़ा ज़माने में
ज़रा ढूँढो कहीं ज़िक्रे-वफ़ा फ़साने में


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जब कल शुरू किया था टाइप करना तो पोस्ट का उन्वान (शीर्षक) बन गया जो अभी लिखा है। फिर इसे टाइप करते-करते पहले शे'र बना, फिर ग़ज़ल की शक़्ल ले ली और इसलिए यहाँ से ग़ायब है ये शे'र। जल्दी ही पूरी ग़ज़ल पेश करूँगा यहीं…

Sunday 2 May 2010

चन्द और पसन्दीदा अशआर

आप सब ने जो पसन्द किया पिछ्ली बार दूसरों का क़लाम, तो आज ख़ाली बैठा था - याददाश्त के सहारे पेश हैं चन्द और मेरे पसंदीदा अशआर -

अशआर ही तो ज़ेहन में गूँजें हैं रात-दिन
और मुझमें नयी जान सी फूँकें हैं रात-दिन
-'मोहन'


यूँ उम्र हमने काटी, दीवाना जैसे कोई
पत्थर हवा में फेंके-पानी पे नाम लिक्खे
- क़ैसर-उल-जाफ़री


उनका ज़िक्र, उनका तसव्वुर, उनकी याद!
कट रही है ज़िन्दगी आराम की !
- शकील बदायूँनी


दुनिया भर की यादें हमसे मिलने आती हैं
शाम ढले इस सूने घर में मेला लगता है


दीवारों से मिलकर रोना अच्छा लगता है
हम भी पागल हो जाएँगे ऐसा लगता है


किसको क़ैसर पत्थर मारूँ, कौन पराया है
शीशमहल में इक-इक चेहरा अपना लगता है
- क़ैसर-उल-जाफ़री


इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है
- मुनव्वर राना


अजब दुनिया है! नाशायर यहाँ पर सर उठाते हैं
जो शायर हैं वो महफ़िल में दरी चादर उठाते हैं


तुम्हारे शहर में मैयत को सब काँधा नहीं देते
हमारे गाँव में छ्प्पर भी सब मिलकर उठाते हैं


इन्हें फ़िरक़ापरस्ती मत सिखा देना कि ये बच्चे
ज़मीं से चूमकर तितली के टूटे पर उठाते हैं
- मुनव्वर राना


बाहम सुलूक थे तो उठाते थे नर्म-गर्म
काहे को मीर कोई दबे, जब बिगड़ गई
- मीर तक़ी 'मीर'


आज सोचा तो आँसू भर आए
मुद्दतें हो गईं मुस्कराए


हर क़दम पे उधर मुड़ के देखा
उनकी महफ़िल से हम उठ तो आए


दिल की नाज़ुक रगें टूटती हैं
याद इतना भी कोई न आए
- क़ैफ़ी 'आज़मी'


ज़मीर काँप तो जाता है आप कुछ भी कहें
वो हो गुनाह से पहले या हो गुनाह के बाद


हवस ने तोड़ दी बरसों की साधना मेरी
गुनाह क्या है ये जाना मगर गुनाह के बाद
- कृष्ण बिहारी 'नूर'


वो लम्हा जब मेरे बच्चे ने माँ कहा मुझको
मैं एक शाख़ से कितना घना दरख़्त हुई
- हुमेरा रहमान


इश्क़ के समझने को वक़्त चाहिए जानाँ
दो दिनों की चाहत में लड़कियाँ नहीं खुलतीं
- परवीन शाकिर


फड़फड़ाती रहीं कितनी उदास तारीख़ें
उम्र रह गई महज़ एक डायरी बनकर
-'मोहन'


हमसे मजबूर का ग़ुस्सा भी अजब बादल है
अपने ही दिल से उठे - अपने ही दिल पर बरसे
- बशीर 'बद्र'

उसकी बातें, उसकी यादें, उसकी धुन में रहते हैं
धरती पर लौटें तो सोचें - लोग हमें क्या कहते हैं
-'मोहन' 


चार दिन के हुस्न पर तुमको बुतो -
ये मिज़ाज, इतना मिज़ाज, ऐसा मिज़ाज  !


मुम्किन नहीं है ऐसी घड़ी कोई बना दे-
जो गुज़रे हुए वक़्त के घण्टों को बजा दे
-नामालूम


और दो-चार अशआर अब चलते-चलते शराब पर भी हो जाएँ? मुलाहिज़ा फ़र्माइए-


पानी किसी हसीं की नज़र से उतार दो
नुस्ख़ा है ये भी इक कसीदा-ए-शराब का
-नामालूम


चाप सुन कर जो हटा दी थी उठा ला साक़ी
शेख़ साहब हैं, मैं समझा था मुसलमाँ है कोई
-नामालूम

किधर से बर्क़ चमकती है देखें ऐ वायज़
मैं अपना जाम उठाता हूँ तू क़िताब उठा


यहाँ लिबास की क़ीमत है, आदमी की नहीं
मुझे गिलास बड़े  दे- शराब कम  कर  दे
- सुमत प्रकाश "शौक़"

Wednesday 31 March 2010

मेरी ख़ुश्बू

ज़र्रा-ज़र्रा मेरी ख़ुश्बू से रहेगा आबाद
मैं लख़्त-लख़्त हवाओं में बिखर जाऊँगा

ज़र्रा-ज़र्रा   मेरी   ख़ुश्बू   से    रहेगा   आबाद

मैं लख़्त-लख़्त हवाओं में बिखर जाऊँगा

Sunday 28 March 2010

कल : एक ग़ज़ल

ज़िन्दगी  कल   रही, रही - न  रही !
बात का क्या कही, कही - न कही !

आँख में रोक मत ये दिल का ग़ुबार
कल ये गंगा  बही,  बही - न बही !

मैल दिल का हटा, उठा न दीवार
कल किसी से ढही, ढही - न ढही !

तेरी कुर्सी को सब हैं नतमस्तक
कल किसी ने सही, सही - न सही

अहम्  की  आज  फूँक  दे   लंका
कल ये तुझसे दही, दही - न दही !

हिमान्शु मोहन
इब्तिदा-आग़ाज़-शुरूआत-पहल

Saturday 27 March 2010

अच्छा लगा

फ़ेसबुक पर किसी प्रशंसक ने पिछले दिनों कहा कि -" विभागीय बातों - रेल से हट कर कुछ देखकर - अच्छा लगा"। बस जनाब, हम अपने शुकराने में जोश में आ गए और उनके कमेण्ट के जवाब में कुछ शे'र अर्ज़ कर दिए वहीं के वहीं। आज ख्याल आया कि क्यों न वो शेर आप सबकी नज़्र किए जाएँ? आख़िरश आप भी तो प्रोत्साहन देते हैं, और प्रोत्साहन देने की सिर्फ़ दो वज़ूहात हो सकती हैं - और दोनों भी हो सकती हैं - पहली कि आप को रचना अच्छी लगी, दूसरी - आप ख़ुद बहुत अच्छे इन्सान हैं और इसीलिए आपको अच्छाई नज़र आती है। वहाँ भी, जहाँ थोड़ी कम होती है। तो पेशे-नज़्र है -
"आप को अच्छा लगा ये जानकर अच्छा लगा।
क़द्रदाँ की क़द्र को पहचान कर अच्छा लगा

लोग क्या जानें किसी को क्या बुरा लग जाय क्यों;
कौन कब पूछे दोनाली तानकर-"अच्छा लगा?"

क़द्र है गुल की कभी खुश्बू से - रंगों से कभी
लायँगे हम और गुल ये ठानकर अच्छा लगा

रेल वाला हूँ, बहुत कुछ रेल सकता हूँ अभी
पर इशारा सिग्नलों का मानकर अच्छा लगा

ताज़ा-ताज़ा शे'र लाया हूँ कि फिर अच्छा लगे
वर्ना हमको ख़ाक जंगल छानकर अच्छा लगा
हिमान्शु मोहन
दस बहाने, इब्तिदा=आग़ाज़=शुरूआत=पहल

मौसम : एक ग़ज़ल

गुलों  पे  तारी  हुआ जबसे  ख़ार का मौसम
कैसा गुमसुम सा है फ़स्ले बहार का मौसम

बेरुख़ी या अदा - कि हो के भी नहीं मौजूद
रू-ब-रू   होके  तेरे  इंतज़ार  का  मौसम !


सुकून ले गया अम्नो - क़रार का मौसम
उनके  वादों  पे  मेरे  ऐतबार  का  मौसम

हार - नूपुर - चूड़ी - टिकुली - सिंगार का मौसम
जाने  फिर  आए - न - आए ये प्यार का मौसम


साल-दर-साल दुखे दिल, हो जैसे कल की बात
कैसा  गुज़रा  था  मेरे  पहले  प्यार  का  मौसम

दग़ा-साज़िश-फ़रेब-झूठ-भितर्घात के बीच
याद आया बहुत माँ के दुलार का मौसम

हिमान्शु मोहन का गूगल प्रोफ़ाइल 
इब्तिदा-आग़ाज़-शुरूआत-पहल

Friday 26 March 2010

दोहे

आज दोहों पर भी हाथ आज़माया है-

 


हरियाली व्यवहार में, मन में खिसके रेत
झुकने में अव्वल मगर, फूलें-फलें न बेंत







कटता शीशम देखकर, गुमसुम बूढ़ा नीम
धागा   चिटका   प्रेम   का,  रोया बैठ रहीम



 


मन का मोल चुका रही, कमल-पात की ओस
आँखों  भर   दौलत   मिली,  साँसों   भर   संतोष


जाने किसकी याद है, जाने किसकी बात
होठों पर कलियाँ खिलीं, आँखों में बारात


यह सशक्त विधा हिन्दी में अभिव्यक्ति की नैसर्गिक क्षमता को उसी तरह तराशती है जैसे उर्दू में शे'र। मज़ा लेकिन गज़ब है, दोनों का।

Saturday 20 March 2010

शुक्रिया

आप सबका शुक्रिया, सराहने और बढ़ावा देने के लिए। तो वह शेर भी पेश है जिसका मैंने शीर्षक के तौर पर इस्तेमाल किया था-
दर्दो-राहत, वस्लो-फ़ुरकत, होशो-वहशत क्या नहीं 
कौन कहता है कि रहने की जगह दुनिया नहीं ?
उम्मीद है कि दुनिया से आज़िज़ फ़लसफ़ेबाज़ शायरी के बजाय दुनिया के लिए लगाव का ये शे'अर भी आपको पसन्द आएगा।

Friday 19 March 2010

दर्दो राहत क्या नहीं!

लिखना मेरे लिए शौक़ भी है, और राहत भी।
मजबूरी तो कभी नहीं रहा मगर दर्द की शिद्दत बढ़ जाने पर मजबूरी ही बन जाता है।
यह कलाम मेरे नहीं हैं, दूसरों के हैं। दिल के क़रीब लगे तो याद रह गए।
याद रह गए तो दोहराने पर भी राहत देते हैं। तो मैंने सोचा कि ये राहत क्यों न आप सबसे बाँटी जाए?

याद इक ज़ख़्म बन गई है वर्ना
भूल जाने का कुछ खयाल तो था   (याद नहीं किसका है)

दुश्मनों से प्यार होता जाएगा
दोस्तों को आज़माते जाइए      (याद नहीं किसका है)

ज़िन्दगी के उदास लम्हों में
बेवफ़ा दोस्त याद आते हैं        (याद नहीं किसका है)

हमें कुछ काम अपने दोस्तों से आ पड़ा यानी
हमारे दोस्तों के बेवफ़ा होने का वक़्त आया (शायद इस्माइल मेरठी)

नाहक है गिला हमसे बेजा है शिकायत भी
हम लौट के आ जाते आवाज़ तो दी होती   (याद नहीं किसका है)

मेह्रबाँ होके बुला लो मुझे चाहे जिस वक़्त
मैं गया वक़्त नहीं हूँ के फिर आ भी न सकूँ  (ग़ालिब)

ज़ह्र मिलता ही नहीं मुझको सितमगर वर्ना
क्या कसम है तेरे मिलने की-के खा भी न सकूँ (ग़ालिब)

कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी!
यों   कोई    बेवफ़ा    नहीं   होता      (बशीर"बद्र")

गरज़ के काट लिए ज़िन्दगी के दिन ऐ दोस्त!
वो   तेरी  याद   में   हों   या   उसे  भुलाने   में    (फ़िराक़)

तुम मेरे पास होते हो गोया
जब कोई दूसरा नहीं होता    (मोमिन)

कुछ इस अदा से आज वो पहलूनशीं रहे
जब तक हमारे पास रहे हम नहीं रहे

आपकी मख़्मूर आँखों की कसम
मेरी मैख़्वारी अभी तक राज़ है    (याद नहीं किसका है)

उनसे ज़रूर मिलना, सलीके के लोग हैं
सर भी कलम करेंगे बड़े एहतराम से  (बशीर"बद्र")

अगर दिखाइए चाबुक सलाम करते हैं
ये शेर वो हैं जो सर्कस में काम करते हैं     (राहत इन्दौरी)

ज़िन्दगी में जो हुआ अच्छा हुआ
जाने दे, मत पूछ कैसे क्या हुआ        (याद नहीं किसका है)

ये इमारत तो इबादतगाह थी
इस जगह इक मैक़दा था क्या हुआ    (नामालूम)

वो बड़ा रहीमो करीम है मुझे ये सिफ़त भी अता करे
तुझे भूलने की दुआ करूँ तो मेरी दुआ में असर न हो (बद्र)

वो आए बज़्म में इतना तो मीर ने देखा
फिर उसके बाद चराग़ों में रोशनी न रही   (मीर)

हर ज़ीहयात का है सबब जो हयात का
निकले है दम उसी के लिए क़ायनात का   (मीर)

अपने ही दिल ने न चाहा के पिएँ आबे-हयात
यूँ तो हम मीर उसी चश्मे प बेजान हुए !   (मीर)

देख तो दिल के जाँ से उठता है
ये धुआँ सा कहाँ से उठता है

ग़ोर किस दिलजले की है ये फ़लक
सुब्ह इक शोला याँ से उठता है

कौन फिर उसको बैठने दे है
जो तेरे आस्ताँ से उठता है

यूँ उठे आह उस गली से हम
जैसे कोई जहाँ से उठता है    (मीर)

कहाँ तो तय था चरागाँ हरेक घर के लिए
कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए           (दुष्यन्त)

होने लगी है जिस्म में ज़ुम्बिश तो देखिए
इस परकटे परिन्द की कोशिश तो देखिए       (दुष्यन्त)

उनकी अपील है के उन्हें हम मदद करें
चाकू की पसलियों से गुज़ारिश तो देखिए      (दुष्यन्त)

आप नज़रों से न कहिए न मैं आँखों से सुनूँ
जिस्म के हिस्से सभी अपना-अपना काम करें   (नामालूम)

तुम मुख़ातिब भी हो, क़रीब भी हो
तुमको देखें के तुमसे बात करें     (फ़िराक)

ये किसने शाख़े-गुल लाकर करीबे-आशियाँ रख दी
के मैंने शौक़े गुलबोसी में काँटों पर ज़ुबाँ रख दी  (नामालूम)

चन्द कलियाँ निशात की चुनकर,
मुद्दतों मह्वे-यास रहता हूँ
तेरा मिलना खुशी की बात सही,
तुझ से मिल कर उदास रहता हूँ   ("साहिर" लुधियानवी)

दुश्मनी जम कर करो पर इतनी गुंज़ाइश रहे
फिर कभी जब दोस्त बन जाएँ तो शर्मिन्दा न हों  (बद्र)

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िन्दग़ी की शाम हो जाए  (बद्र)

ग़ज़ल

आज आल्मारी साफ़ करते समय एक पुर्ज़े पर लिखी हुई अपनी एक पुरानी रचना (2007 की) पड़ी मिली। सोचा कि आप को ही पेश कर दूँ-

न दीन और न  ईमान रहा
दिल बुतों पे सदा क़ुर्बान रहा

वो जिसने हम पे लगाई तोहमत
सुना फिर बरसों परेशान रहा

दो घड़ी के सुकून की ख़ातिर
तमाम उम्र वो हैरान रहा

दोस्त को दोस्त समझने वाला
दोस्ती करके परेशान रहा

कहे औलादों की दानिशमन्दी
"हमारा बाप तो नादान रहा"

खुले गेसू, ये तबस्सुम, ये अदा!
सुना कल फिर कोई मेहमान रहा

घर की बुनियाद थी दीवारों पे
घर में रिश्ते नहीं सामान रहा

उन्होंने हिन्दी न समझी न पढ़ी
उनका हिन्दी पे ये एहसान रहा

ऐसे हालात में कह पाना ग़ज़ल
यक़ीनन सख़्त इम्तेहान रहा

आदाब!