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Friday, 14 May, 2010

सारे सुख़न हमारे झूठ

सारे सुख़न* हमारे झूठ
गाँव सहन* चौबारे झूठ


चना-चबेना हो तो दो-
किश्मिश और छुआरे झूठ


दुनिया सपने जैसा सच
आँख खुली तो सारे झूठ


उनके होठों पर लगते
कितने प्यारे-प्यारे झूठ


परदेसी के वादों पर
कब तक रहें कुँआरे झूठ


अपना कमरा एसी है
सूखा-बाढ़ तुम्हारे झूठ


जन-गण-मन असमञ्जस में
सत्ता के गलियारे झूठ


थाली की रोटी आगे
चन्दा और सितारे झूठ


झूठ सरासर क़ायम है
सच के सारे नारे झूठ


माज़ी* से मुस्तकबिल* तक
सुख के रहे दुलारे झूठ


मँझधारों सच तोड़े दम
तकते रहें किनारे झूठ
**************************
सुख़न = कथन, उक्ति, वादा, बातचीत, कविता, कहावत। (जो कुछ शायर कहे)
सहन = आँगन
माज़ी = अतीत, बीता हुआ
मुस्तक़बिल = भविष्य, आगामी

7 comments:

M VERMA said...

थाली की रोटी आगे
चन्दा और सितारे झूठ
बहुत खूब
अच्छा लगा

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

सरकार ! नतमस्तक हूँ आपके अंदाजे-बयां पर !
क्या खूब कहा है ---
'' उनके होठों पर लगते
कितने प्यारे-प्यारे झूठ .''
@ गाँव सहन चौबारे झूठ ------ सहन = सहने योग्य होगा क्या ?
.........
@ थाली की रोटी आगे
चन्दा और सितारे झूठ ..
--------- भूखे भजन न होंय गुपाला , सही ही कहा है ; '' राव रंग
भूल गयी , भूल गयी खंजड़ी / तीन चीज याद रही , नोन तेल लकड़ी | ''
..........
@ माज़ी* से मुस्तकबिल* तक
सुख के रहे दुलारे झूठ ..
--------- यही सच है , चाहे माजी का स्वर्णकाल ही क्यों न रहा हो !
..........
आभार !

दिलीप said...

waah bahut achche....jan gan man asamanjas me hai, satta ke galiyaare...waah

प्रवीण पाण्डेय said...

अपनों में भावुक होने से,
पकड़े गये हमारे झूठ

E-Guru Rajeev said...

झूठ हमारा नहीं हमारे पूर्वजो का संस्कार है



जनता, नेता, अभिनेता सबको यह स्वीकार है !


झूठ बोले बिना आजकल गाडी नहीं चलती है


झूठ बोलने से कभी-कभी सफलता भी मिलती है !


जो जितना ज्यादा झूठ बोलता है वो उतना ज्यादा पाता है


इतिहास उठा कर देख लो सच बोलने वाला पत्थर ही खaता है !


अजीब विडंबना है ये, की आजकल सच्चे का मुह काला है

सबको पता की झूठे का बोल बाला है !


झूठ तो कुछ है ही नहीं, जहां तक मुझको ज्ञान है


ये मै नहीं कहता कहते वेद पुराण है !


"सर्व खल्विदं ब्रह्म" छान्दोग्योप्निशत का यह मन्त्र है एक


सच और झूठ की लड़ाई अब मुझसे नहीं जाती देख !


जो होता है वो होने दो मेरा यह विचार है


झूठ हमारा नहीं पूर्वजों का संस्कार है !

सर्वत एम० said...

एक समय था जब मैं कविता में त्रुटियों पर लोगों को कमेन्ट में टोक देता था. उन्हीं दिनों पहली बार आपके ब्लॉग पर आया,कमेन्ट दिया फिर आपने दुबारा कमेन्ट में टोकने का अवसर ही नहीं दिया. निस्संदेह, गजलों में आपने जी तोड़ मेहनत की है और इसी का नतीजा है कि छोटी बहर में भी आप कमाल की बुनावट पेश कर रहे हैं. keep it up.

हिमान्शु मोहन said...

सर्वत साहब,
नमस्कार। बहुत-बहुत शुक्रिया आपके पधारने का। आपकी हौसला-अफ़्ज़ाई का मैं तहे-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ। गज़ल कहते हुए अर्सा बीता। मुझे ख़ुद नहीं पता था कि पहली रचना जो मैंने 16 बरस की उम्र में बारहवीं में पढ़ते हुए, अंग्रेज़ी के पीरियड में उसी कॉपी में दर्ज की थी - वो ग़ज़ल ही थी। ये तो बाद में पहचान पाया, और इस याद के नाम पर ही उसमें आज तक कोई संशोधन नहीं किया।
आपकी इस्लाहो-निगहबानी का उम्मीदवार,
शुभेच्छु,