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Friday, 27 August 2010

अश'आर चन्द यूँ भी

आज के हालात का मैं तब्सरा हूँ
ख़ुश-तबस्सुम-लब मगर अन्दर डरा हूँ

बस गए जो वो किसी शर्त छोड़ते ही नहीं
टूटा-फूटा सा पुराना मकान मेरा दिल!

इस राह पे चलना भी ख़ुद हासिले-सफ़र है
मंज़िल क़रीब है पर दुश्वार रहगुज़र है


आए हैं, मुँह फुलाए बैठे हैं
लगता है ख़ार खाए बैठे हैं
उधर लाल-आँखें, चढ़ी हैं भौंहें
हम इधर दिल बिछाए बैठे हैं

Friday, 20 August 2010

जागते रहिए ज़माने को जगाते रहिए

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जागते रहिए ज़माने को जगाते रहिए
ख़ैरियत-ख़ैरियत का शोर मचाते रहिए


वो जो सह लें, न कहें-उनको सहाते रहिए
वर्ना कह दें तो मियाँ ! चेहरा छुपाते रहिए


शम्मा यादों की मज़ारों पे जलाते रहिए
रोज़ इक बेबसी का जश्न मनाते रहिए


हुस्न गुस्ताख़ तमन्ना से दूर? नामुम्किन!
लाख बारूद को आतिश से बचाते रहिए


या तो खा जाइए, या रहिए निवाला बनते,
शाम के भोज का दस्तूर निभाते रहिए
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और शे'र हैं, अभी फुर्सत नहीं है टाइप करने की. बाद में लाऊँगा...

Friday, 6 August 2010

उन्होंने कह दिया अच्छा सुख़न है


ज़माना पेश हम से ढंग से आए-
ज़माने को भी कोई तो बताए!


यही सोचे हैं बैठे सर झुकाए
वो देखें आज क्या तोहमत लगाए

उन्होंने कह दिया अच्छा सुख़न है
मेरे अश'आर ख़ुश-ख़ुश लौट आए


मुहब्बत की भी कोई उम्र तय है?
अगर अब है तो फिर आए-न-आए!


झरे दिन जैसे मुट्ठी रेत की, या
उमर-मछली फिसल दरिया में जाए
………उमर-मछ्ली फिसल दरिया में जाए!

Tuesday, 20 July 2010

सब लोग ज़माने में सितमगर नहीं होते

यह भी मेरी एक पूर्व-प्रकाशित रचना ही है। यह अन्तर्जाल पर और एक साहित्यिक पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है। मैंने इसे इसलिए रख छोड़ा था कि जब कभी कुछ नया लेखन न हो पाए - तो ब्लॉग पर  तारतम्य बनाए रखने के लिए इसे आप की नज़रे-क़रम के हवाले किया जायगा। सो आज कर रहा हूँ:
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सब लोग ज़माने में सितमगर नहीं होते
क़द एक हो तो लोग बराबर नहीं होते


होते हैं मददगार - कई बार अजनबी
जिन लोगों से उम्मीद हो-अक्सर नहीं होते

उनको तलाश लेंगे करोड़ों के बीच हम
सारे गुलों के हाथ में पत्थर नहीं होते

क़ुदरत के इल्तिफ़ात से है शायरी का फ़न
सब शे'र कहने वाले भी शायर नहीं होते

हम ही नहीं ग़ज़ल से - हमीं से ग़ज़ल भी है
हम से दिवाने सारे सुख़नवर नहीं होते

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सितमगर: अत्याचारी
फ़न : हुनर, कला, योग्यता
इल्तिफ़ात : अनुग्रह, कृपा, प्रसन्नता (बहुवचन में)
सुख़नवर: बहुत अच्छा शायर, ग़ज़लसरा, ग़ज़लगो

Friday, 16 July 2010

क्या जाने

एक छोटी सी रुबाई:
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अदा की चोट - अदा क्या जाने
हया क्या है, भला वो क्या जाने
"अदा-वफ़ा-हया इक संग चहिए"-
ख़ुद को समझे हो क्या ख़ुदा जाने!